
TI Dilip Puri funeral: मध्यप्रदेश के देवास जिले के खातेगांव टीआई दिलीप पुरी की अवैध शराब से भरे ट्रक को रोकने और कार्रवाई के दौरान ट्रक की चपेट में आने से उनकी दर्दनाक मृत्यु हो गई थी। ड्यूटी के दौरान जान गंवाने वाले दिलीप पुरी को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। सीएम डॉ. मोहन यादव ने उन्हें शहीद का दर्जा देने की घोषणा की। धार के बरमंडल में शहीद दिलीप पुरी का अंतिम संस्कार सामान्य हिंदू परंपरा के अनुसार नहीं बल्कि, दशनाम गोस्वामी परंपरा (Dashnam Goswami Tradition) के अंतर्गत उन्हें समाधि दी गई थी। इस दौरान संत-महंतों की मौजूदगी में धार्मिक विधि-विधान और मंत्रोच्चार के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी गई। आइए जानते है क्या ही ये परंपरा?
दशनाम संप्रदाय भारतीय सनातन परंपरा की प्राचीन संन्यास परंपराओं में से एक है। इसका ऐतिहासिक संबंध आदि शंकराचार्य द्वारा व्यवस्थित की गई संन्यास परंपरा से माना जाता है। इस संप्रदाय में संन्यासियों को दस नामों से संबोधित किया जाता है। इनमें गिरि, पुरी, भारती, सरस्वती, तीर्थ, आश्रम, वन, अरण्य, पर्वत और सागर शामिल हैं।
दशनाम परंपरा में 'पुरी' भी एक प्रमुख नाम है। इस परंपरा से जुड़े संन्यासियों और कुछ गोस्वामी समुदायों में निधन के बाद सामान्य अग्नि संस्कार के स्थान पर समाधि देने की परंपरा प्रचलित है। हालांकि यह व्यवस्था व्यक्ति की धार्मिक स्थिति, संप्रदाय और स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
हिंदू धर्म की संन्यास परंपरा में शरीर को नश्वर माना गया है। आध्यात्मिक दृष्टि से संन्यासी अपने जीवन को सांसारिक मोह-माया से अलग कर ईश्वर साधना और आत्मज्ञान के लिए समर्पित करता है। इसी मान्यता के कारण संन्यासियों के देहावसान के बाद उन्हें सामान्य गृहस्थ व्यक्ति की तरह अग्नि संस्कार देने के बजाय समाधि देने की परंपरा रही है।
समाधि को शरीर की अंतिम विदाई के साथ साधना, वैराग्य और आध्यात्मिक जीवन के सम्मान के रूप में देखा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि संन्यासी जीवन में व्यक्ति सांसारिक बंधनों से ऊपर उठकर आत्मिक मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ता है। इसलिए समाधि की प्रक्रिया को उसके आध्यात्मिक जीवन की परंपरा के अनुरूप अंतिम संस्कार माना जाता है।
शहीद टीआई दिलीप पुरी को दशनाम गोस्वामी परंपरा के अनुसार समाधि दिया जाना उनके पारिवारिक और धार्मिक संस्कारों के निर्वहन का प्रतीक रहा। एक ओर पुलिस विभाग ने उन्हें कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी के रूप में राजकीय सम्मान दिया, वहीं दूसरी ओर संत-महंतों ने धार्मिक परंपरा के अनुसार उनकी अंतिम विदाई की प्रक्रिया पूरी कराई।