
Dhar news: रक्षाबंधन की खूबसूरती सिर्फ भाई की कलाई पर सजी राखी में नहीं, बल्कि उन रिश्तों में छिपी है जिन्हें प्रेम और अपनत्व से नया नाम मिल जाता है। धार के नालछा दरवाजा क्षेत्र के उज्जैनकर परिवार की सैजल ने इसी भावना को अपने जीवन का हिस्सा बनाया है। एक ही राखी की डोर से वह परिवार की अलग-अलग पीढिय़ों के तीन रिश्तों को जोड़ती हैं। दादा दिनकरराव, पिता प्रवीण और काका मनीष की कलाई पर राखी बांधकर सैजल ने बहन होने का रिश्ता निभाया है। इस रिश्ते की शुरुआत छोटी उम्र में दादा और पिता की सूनी कलाई देखकर हुई थी। दादा दिनकरराव की बहन का निधन हो गया था।
इसके बाद रक्षाबंधन पर उनकी कलाई सूनी रहती थी। बालिका सैजल ने यह कमी महसूस की और दादा की कलाई पर राखी बांधना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे यह सिर्फ राखी बांधने की रस्म नहीं रही, बल्कि दादा-पौत्री के रिश्ते में एक नया भाव जुड़ गया। वह दादा की पोती होने के साथ उनकी बहन की भूमिका भी निभाने लगीं। पिता प्रवीण की भी कोई सगी बहन नहीं थी। ऐसे में सैजल ने पिता और काका मनीष को भी राखी बांधना शुरू किया। एक छोटी-सी पहल ने परिवार में रिश्तों की ऐसी माला पिरोई, जिसमें उम्र और पीढ़ी की सीमाएं भी पीछे छूट गईं।
सैजल का अपना कोई सगा भाई नहीं है। उन्होंने परिवार की कुटुंब शाखा के बच्चों को राखी बांधकर भाई-बहन के रिश्ते को आगे बढ़ाया। अब काका मनीष की बेटी दिशा भी उसी परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। दोनों बहनें परिवार को जोडऩे वाली इस डोर को मजबूत कर रही हैं। पिता प्रवीण कहते हैं कि सैजल और दिशा परंपराओं को निभाने के साथ उन्हें नया अर्थ भी दे रही हैं।
सैजल ने एमबीए की पढ़ाई पूरी की है और नौकरी भी कर रही हैं। वह पिता के व्यवसाय में भी हाथ बंटाती हैं। यानी वह सिर्फ भावनात्मक रूप से ही नहीं, बल्कि व्यवहारिक रूप से भी परिवार की ढाल बनी हैं और कई पीढिय़ों को एक-दूसरे का सहारा बनने का संदेश दे रही है।