
Bhagwan Dattatreya Elephant Teaching: महापुराण में भगवान दत्तात्रेय ने अपने चौबीस प्राकृतिक गुरुओं से प्राप्त शिक्षा का राजा यदु के समक्ष वर्णन किया है, जिसमें जीवन प्रबंधन के तत्व निहित हैं। महापुराण के एकादश स्कंध में भगवान अवधूत दत्तात्रेय महाराज अपने 13वें गुरु गज (हाथी) से प्राप्त शिक्षा का वर्णन करते हैं। सामान्य दृष्टि में हाथी केवल बल, पराक्रम और ऐश्वर्य का प्रतीक है, किंतु आध्यात्मिक दृष्टि ने वह इंद्रियासक्त है।
पदापि युवती भिक्षुर्न स्पृशेद् दारवीमपि।
स्पृश करीव बध्येत करिण्या असंगतः ।।
हे राजन… एक आध्यात्मिक साधक या संन्यासी को पैर से भी काष्ठ निर्मित स्त्री प्रतिमा का स्पर्श नहीं करना चाहिए, क्योंकि जैसे हथिनी के संसर्ग में पड़कर हाथी बंधन को प्राप्त हो जाता है, वैसे ही विषय स्पर्श से साधक भी देहाभिमान और संसार बंधन में आबद्ध हो जाता है। हे राजन… अध्यात्म पथ के पथिक को कभी भी किसी स्त्री को भोग्य वस्तु के रूप में ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि विषयासक्ति ही उसके लिए मृत्यु है।
जैसे कामोन्मत्त हाथी अधिक बलवान हाथियों द्वारा मारा जाता है, वैसे ही विषय वासनाओं में आसक्त मनुष्य भी अपने ही विकारों और संसार की प्रबल शक्तियों से पराजित हो जाता है। 'दारवीमपिं' शब्द में संपूर्ण साधना का रहस्य है। यहां केवल स्त्री-संसर्ग का ही निषेध नहीं किया, अपितु काष्ठ निर्मित स्त्री प्रतिमा के स्पर्श तक से सावधान किया। इसका अभिप्राय किसी व्यक्ति विशेष का निषेध नहीं, बल्कि मन की उस चंचल प्रवृत्ति का निरोध है जो जड़ वस्तु में भी चेतना का आरोपण करके आसक्ति उत्पन्न कर देती है। वासना का अंकुर बाहर नहीं, भीतर फूटता है। बाहा विषय तो केवल निमित्त हैं, वास्तविक कारण मन का संकल्प है। अतः साधना का संरक्षण उसी समय संभव है, जब विषयासक्ति के प्रथम कंपन को विवेक से रोक दिया जाए।
एक हथिनी के लिए अनेक गजराज प्राणघातक संघर्ष करते हैं। इसी प्रकार विषयासक्ति मनुष्य को भी स्पर्धा, हिंसा, छल, द्वेष और अशांति के चक्रव्यूह में धकेल देती है। अंततः वह बाहर से पराजित होने से पहले भीतर से ही टूट जाता है। हे राजन, स्त्री वैराग्य मार्ग के संन्यासी के लिए विषयासक्ति का प्रतीक है। उसी प्रकार गृहस्थ के लिए पर-पुरुष या पर - स्त्री, धन, पद, यश अथवा कोई भी इंद्रिय विषय यदि आसक्ति का कारण बन जाए, तो वही बंधन का रूप धारण कर लेता है। इसलिए यहां स्त्री त्याज्य नहीं है, अपितु त्याज्य उसमें भोगासक्ति। त्याज्य संसार नहीं, त्याज्य संसार के प्रति मोह है। हे राजन! हाथी को अपना गुरु मानकर, जो शिक्षा मैंने ग्रहण की है, वह प्रत्येक आध्यात्मिक साधक के लिए अमूल्य चेतावनी है। आध्यात्मिक पतन प्रायः किसी बड़े अपराध से नहीं, बल्कि मन में उठने वाले सूक्ष्म आकर्षण से आरंभ होता है। अतः साधक को चाहिए कि वह प्रारंभ में ही विषय - संकल्प का परित्याग करे, इंद्रियों को विवेक के अधीन रखे तथा मन को भगवद्भक्ति में प्रतिष्ठित करे ।
हे राजन! अरण्य का महाबली गजराज असंख्य पशुओं पर विजय प्राप्त कर सकता है, किंतु अपनी ही इंद्रिय पर विजय न होने के कारण एक साधारण शिकारी द्वारा बंदी बना लिया जाता है। शिकारी गहरा गड्ढा खोदकर उसके ऊपर तृण बिछा देता है और समीप काष्ठ से निर्मित कृत्रिम हथिनी स्थापित कर देता है। उन्मत्त हाथी उस कृत्रिम रूप के आकर्षण में पड़कर गड्ढे में गिर जाता है। उसकी पराजय किसी बाहा बल से नहीं, बल्कि अपनी ही वासना से होती है। हे राजन! मनुष्य को संसार नहीं बांधता, उसकी अपनी आसक्ति ही उसे बांधती है। विषय स्वयं दोषी नहीं है, विषयों में लिप्त मन ही बंधन का कारण है। विषयासक्ति केवल बंधन नहीं, अपितु मृत्यु है। यह मृत्यु शरीर की नहीं, अपितु विवेक की मृत्यु है, संयम की मृत्यु है, शांति की मृत्यु है और साधक के आत्मोन्नति की मृत्यु है।