Ekadashi Mata Ki Katha: एकादशी व्रत के दिन जरूर पढ़ें एकादशी माता की कहानी
Ekadashi Mata Ki Katha: पौराणिक ग्रंथों के सतयुग में अगहन मास की उत्पन्ना एकादशी की कहानी के अनुसार मुर नाम का एक दैत्य था, जिसने इंद्र और अन्य देवताओं को पराजित कर देव लोक से निकाल दिया। इस पर भयभीत देवता भगवान शिव से मिले तो उन्होंने देवताओं को श्रीहरि विष्णु के पास जाने के लिए कहा।
यहां पहुंचे देवताओं की प्रार्थना पर क्षीरसागर में शयन कर रहे श्रीहरि उठे और मुर के वध के लिए चन्द्रावतीपुरी पहुंचे। यहां सुदर्शन चक्र से उन्होंने अनगिनत दैत्यों का वध किया और लंबे समय तक युद्ध करते-करते वो बद्रिका आश्रम की सिंहावती नाम की 12 योजन लंबी गुफा में पहुंच गए और सो गए। यहां पीछे से पहुंचे मुर ने भगवान पर प्रहार करने का प्रयास किया, इसी बीच श्रीहरि विष्णु के शरीर से एक कन्या अवतरित हुई, उसने मुर दैत्य का वध कर दिया।
इस बीच श्रीहरि भी जाग गए और देवी के बारे में पूछा। इस पर देवी ने खुद का परिचय दिया और कहा कि उसका नाम एकादशी है, और उनके ही आशीर्वाद से उसने मुर का वध किया है। इस पर श्रीहरि ने एकादशी को सभी तीर्थों में प्रधान होने का वरदान दिया। इस तरह श्रीविष्णु के शरीर से माता एकादशी के उत्पन्न होने की यह कथा पुराणों में वर्णित है। इस एकादशी के दिन त्रिस्पृशा यानी कि जिसमें एकादशी, द्वादशी और त्रयोदशी तिथि भी हो, वह बड़ी शुभ मानी जाती है।
इस दिन एकादशी का व्रत रखने से एक सौ एकादशी व्रत करने का फल मिलता है। साथ ही वरदान दिया कि अगर कोई एकादशी व्रत रखेगा तो उसके सारे पापों का नाश हो जाएगा, मृत्यु के बाद उसे विष्णु लोक मिलेगा।