
Karwa Chauth 2026:करवा चौथ का पहला व्रत नवविवाहिताओं के लिए सुहाग, सौभाग्य से जुड़ा खास अवसर होता है। लेकिन इस बार शुक्र तारा अस्त (Shukra Asta) होने से ग्रहों की स्थिति का असर पड़ सकता है। मान्यता है, शुक्रास्त के दौरान मांगलिक कार्यों पर रोक रहती है। ऐसे में पहली बार करवा चौथ करने वाली महिलाओं के सामने असमंजस की स्थिति है। कुछ विद्वान नए व्रत का संकल्प लेने से बचने की सलाह दे रहे हैं। कुछ कह रहे हैं-सुहागिनें व्रत और पूजन कर सकती हैं। ऐसे में पारिवारिक परंपरा व स्थानीय पंचांग के अनुसार निर्णय लेने की सलाह दी जा रही है। वहीं, वर्षों से व्रत कर रहीं सुहागिनों के लिए कोई बाधा नहीं है। उद्यापन करने वाली महिलाओं को भी शुभ मुहूर्त व का इंतजार करना पड़ सकता है। ज्योतिषीय मान्यताओं में शुक्र व गुरु का उदय शुभमांगलिक कार्यों के लिए आवश्यक माना जाता है।
ज्योतिर्विद पं. आनंदशंकर व्यास के अनुसार, जो महिलाएं वर्षों से व्रत करती आ रही हैं, उनके लिए व्रत रखने पर सामान्यतः रोक नहीं है। वे परंपरा के अनुसार व्रत और पूजन कर सकती हैं। हालांकि, शुक्र अस्त होने के दौरान नए मांगलिक संकल्प और उद्यापन को लेकर सावधानी बरतना उचित है। जिनके करवा चौथ व्रत का इस वर्ष उद्यापन होना है, उन्हें शुक्रास्त के दौरान इसे टालने की सलाह दी जा रही है। मान्यता के अनुसार, उद्यापन शुभ तिथि पर किया जाना चाहिए।
चतुर्थी तिथि: 29 अक्टूबर
पूजा का मुहूर्तः शाम 5.51 से 7.07 बजे तक
उज्जैन में चंद्रोदयः रात 8.38 बजे
कथा के अनुसार एक साहूकार के सात लड़के और एक लड़की थी। सभी का विवाह हो चुका था। एक बार कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को सेठानी सहित उसकी सातों बहुएं और बेटी ने करवा चौथ का व्रत रखा। रात में जब साहूकार के सभी लड़के भोजन करने के लिए बैठे तो उन्होंने अपनी बहन से भी भोजन करने के लिए कहा। लेकिन बहन ने तो व्रत रखा था। बहन ने अपने भाई से कहा अभी चांद नहीं निकला है। मैं चांद के निकलने पर उसे अर्घ्य देकर ही भोजन करूंगी।
चूंकि साहूकार के बेटे अपनी बहन से बहुत प्रेम करते थे, इसलिए उनसें अपनी बहन का भूख से व्याकुल चेहरा देखा नहीं जा रहा था। तब साहूकार के बेटे नगर के बाहर चले गए और वहां पर उन्होंने एक पेड़ पर चढ़ कर अग्नि जला दी। घर वापस आकर उन्होंने अपनी बहन से कहा कि देखों चांद आ गया है। अब तुम अर्घ्य देकर भोजन ग्रहण करो। साहूकार की बेटी ने अपनी भाभियों से भी कहा चांद को अर्घ्य देने का कहा लेकिन ननद की बात सुनकर भाभियों ने कहा- बहन अभी चांद नहीं निकला है, तुम्हारे भाई धोखे से अग्नि जलाकर उसके प्रकाश को चांद के रूप में तुम्हें दिखा रहे हैं।
लेकिन साहूकार की बेटी ने अपनी भाभियों की बात को अनसुनी कर दिया और उसने भाइयों द्वारा दिखाए गए चांद को अर्घ्य देकर भोजन कर लिया। इससे उसका करवा चौथ का व्रत भंग हो गया। गणेश जी की अप्रसन्नता के कारण उस लड़की का पति बीमार पड़ गया और उसके घर में बचा हुआ सारा धन उसकी बीमारी को सही करने में लग गया। साहूकार की बेटी को जब अपने दोषों का पता लगा तो उसे बहुत पश्चाताप हुआ। उसने गणेश जी से क्षमा मांगी और फिर से विधि-विधान पूर्वक चतुर्थी का व्रत शुरू कर दिया। उसने व्रत के दौरान उपस्थित सभी लोगों का श्रद्धानुसार आदर किया और तदुपरांत उनसे आशीर्वाद ग्रहण किया। इस प्रकार उस लड़की के श्रद्धा भाव को देखकर भगवान गणेश जी उसपर प्रसन्न हुए और उसके पति को उन्होंने जीवनदान प्रदान किया। उसे सभी प्रकार के रोगों से मुक्त करके धन, संपत्ति और वैभव से युक्त कर दिया।