नवरात्रि के छठें दिन (sixth day of Navratri) मां दुर्गा के छठे स्वरूप माता कात्यायनी की पूजा की जाती है। ये ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं, जानिए कैसे करनी चाहिए मां कात्यायनी की पूजा ( Maa Katyayani Puja), मां कात्यायनी के मंत्र आदि।
Navratri: माता दुर्गा के इस स्वरूप का अवतार कात्यायन ऋषि की पुत्री के रूप में हुआ था, इसलिए इन्हें माता कात्यायनी कहा जाता है। इनकी चार भुजाएं अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित हैं।
इनके एक हाथ में तलवार, दूसरे में कमल है, दो हाथ वर मुद्रा और अभय मुद्रा में हैं। माता का वाहन सिंह है। मान्यता है कि गोपियों ने भगवान कृष्ण की प्राप्ति के लिए इनकी पूजा की थी, ज्योतिष में इनका संबंध बृहस्पति से माना जाता है। कहा जाता है इनकी पूजा से लड़कियों को योग्य वर की प्राप्ति होती है।
1. माता की पूजा का सबसे अच्छा समय गोधूलि वेला है, सर्वप्रथम कलश और भगवान गणेश की पूजा करें।
2. भगवान गणेश को फूल, अक्षत, रोली, चंदन अर्पित करें, उन्हें दूध, दही, घी, शर्करा, शहद से स्नान कराएं।
3. भगवान गणेश को भोग लगाएं, आचमन कराएं, पान सुपारी भेंट करें।
4. फिर नवग्रह दश दिग्पाल, नगर देवता ग्राम देवता की पूजा करें।
5. पीले या लाल वस्त्र धारण कर अपने हाथ में फूल लेकर माता कात्यायनी का ध्यान करें।
6. माता का पंचोपचार पूजन करें (सुगंधित फूल, पीला नैवेद्य, चांदी-मिट्टी के पात्र में शहद अर्पित करें, दीपक जलाएं, तीन गांठ हल्दी भी चढ़ाएं)
7. माता के मंत्रों का 51 माला जाप करें और घी या कपूर से आरती करें।
चन्द्रहासोज्जवलकरा शाईलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी।।
या देवी सर्वभूतेषु मां कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्वनीम॥
स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम।
वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालंकार भूषिताम।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम॥
प्रसन्नवदना पञ्वाधरां कांतकपोला तुंग कुचाम।
कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम॥
माता कात्यायनी का स्तोत्र पाठ
कंचनाभा वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।
स्मेरमुखीं शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोअस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालंकार भूषितां।
सिंहस्थितां पदमहस्तां कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥
परमांवदमयी देवि परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति,कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥
कात्यायनी मुखं पातु कां स्वाहास्वरूपिणी।
ललाटे विजया पातु मालिनी नित्य सुन्दरी॥
कल्याणी हृदयं पातु जया भगमालिनी॥
धर्म ग्रंथों में मां कात्यायनी अमोघ फलदायिनी बताई गईं हैं। शिक्षा प्राप्ति के क्षेत्र में प्रयासरत भक्तों को माता की अवश्य उपासना करनी चाहिए। ये कुंआरी लड़कियों को उनके योग्य पति प्राप्त होने का भी आशीर्वाद देती हैं।
इनकी पूजा से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति होती है। मान्यता के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को हमेशा भय बना रहता है और जरा सी बात पर पैर कांपने लगते हैं, साथ ही वह कोई निर्णय नहीं ले पाता है, तो व्यक्ति को नवरात्रि के छठे दिन माता कात्यायनी को प्रसन्न करने के उपाय करने चाहिए।
इसके लिए शख्स को स्वच्छ होकर घी का दीपक जलाना चाहिए और ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ऊँ कात्यायनी देव्यै नमः मंत्र का जाप सुबह शाम करना चाहिए। इसके अलावा रात में सोते समय इस मंत्र को पीपल के पत्ते पर पीपल की लकड़ी की कलम से केसर से लिखकर अपने सिरहाने रख लें, सुबह मां के मंदिर में रख आएं। ऐसा करने से भय से छुटकारा मिल जाता है।
किसी शख्स के विवाह में बाधा आ रही है तो कात्यायनी यंत्र की प्राण प्रतिष्ठा कराकर निश्चित संख्या में तय दिनों तक कात्यायनी मंत्र का जाप करना चाहिए। जो खुद साधना नहीं कर सकते, वो किसी पुरोहित से भी इसका अनुष्ठान करा सकते हैं।