Somnath Swabhiman Parv : गुजरात के अहमदाबाद, सूरत, वडोदरा और राजकोट से विशेष ट्रेनों द्वारा हजारों श्रद्धालु सोमनाथ पहुंचे। पहले ज्योतिर्लिंग की धरती पर शुरू हुए ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ में श्रद्धा, इतिहास और सांस्कृतिक गौरव का अद्भुत संगम देखने को मिला।
Somnath Swabhiman Parv : गुजरात के चार बड़े शहरों से हजारों श्रद्धालु स्पेशल ट्रेनों में बैठकर सोमनाथ पहुंचे। स्टेशन पर कदम रखते ही चारों तरफ “हर हर भोले” और “जय सोमनाथ” के नारे गूंज उठे। ये सिर्फ एक यात्रा नहीं थी, ये अपने पूर्वजों की यादों, उनके संघर्ष और हमारी परंपरा को सलाम करने का मौका था।
गुजरात सरकार ने सोमनाथ के पहले ज्योतिर्लिंग महादेव की मौजूदगी में 'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' की शुरुआत की और इसके लिए अहमदाबाद, सूरत, वडोदरा और राजकोट से खास ट्रेनें चलाईं। आज राजकोट से आई ट्रेन जैसे ही स्टेशन पर रुकी, माहौल में जोश और श्रद्धा दोनों साफ नजर आ रहे थे।
राजकोट से आए दीपकभाई दवे कहते हैं, “हम यहां सिर्फ दर्शन के लिए नहीं आए, हम अपने गौरवशाली इतिहास को महसूस करने और उसे सम्मान देने आए हैं। सोचिए, इतने हमलों के बाद भी सोमनाथ का ये भव्य मंदिर आज भी खड़ा है। ये हमारी संस्कृति की ताकत है। सरकार ने स्वाभिमान पर्व जैसा आयोजन किया, इसके लिए हम शुक्रगुजार हैं। ये सिर्फ एक उत्सव नहीं, हजार साल के संघर्ष में शामिल होने जैसा है।”
वहीं, देवांग जानी ने कहा, “राजकोट से सीधी ट्रेन मिलने से आना बहुत आसान हो गया। सरदार पटेल ने मंदिर को फिर से बनवाया और अब प्रधानमंत्री मोदी इसे दुनिया में पहचान दिला रहे हैं। इस सबको देखकर सच में महसूस होता है कि आज हमारी आत्मा और सम्मान दोनों का सम्मान हो रहा है।”
जगदीशभाई परमार को तो यहां आकर ये अहसास हुआ कि सोमनाथ के लिए कितने लोगों ने बलिदान दिया है। वो कहते हैं, “सरकार ने स्पेशल ट्रेन चलाकर हमें इस विरासत से जोड़ दिया। इसके लिए हम प्रधानमंत्री मोदी और पूरी सरकार के आभारी हैं।” अगले तीन दिनों तक यहां कई कार्यक्रम होंगे, जिनमें सोमनाथ की पौराणिक गाथा अलग-अलग अंदाज में सुनाई जाएगी। 11 जनवरी तक चलने वाले इस पर्व में बाकी शहरों से भी श्रद्धालु पहुंचेंगे।
ये सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं है। ये सोमनाथ के हजार साल के संघर्ष, उसके बार-बार उजड़ने और फिर खड़े होने की कहानी है। जो नई पीढ़ी तक पहुंचाई जा रही है। 1026 में महमूद गजनवी के हमले से लेकर, न जाने कितने विदेशी आक्रमणकारियों ने इस मंदिर को मिटाने की कोशिश की, लेकिन हर बार देश के वीरों ने जान की बाज़ी लगाकर इसे बचाया। इस पर्व में हमीरजी गोहिल, वेगदाजी भील और न जाने कितने शहीदों की कुर्बानी को भी याद किया जा रहा है।