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Dwadash Jyotirling Stotram: सोमनाथ से घृष्णेश्वर तक, शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों की दिव्य स्तुति, द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र हिंदी अर्थ सहित

12 Sacred Jyotirlingas of Lord Shiva : द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् भगवान शिव के बारह पवित्र ज्योतिर्लिंगों की दिव्य स्तुति है। यहाँ सोमनाथ से घृष्णेश्वर तक सभी 12 ज्योतिर्लिंगों का संस्कृत स्तोत्र, सरल हिंदी भावार्थ और आध्यात्मिक महत्त्व एक साथ प्रस्तुत है।

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भारत

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Manoj Vashisth

Jan 09, 2026

Dwadash Jyotirling Stotra

Dwadash Jyotirling Stotra : मोक्षदायी स्तोत्र: द्वादश ज्योतिर्लिंगों की महिमा और भावार्थ (फोटो सोर्स: AI image@Gemini)

Dwadash Jyotirling Stotram: द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् भगवान शिव के बारह स्वयंप्रकाशित ज्योतिर्लिंगों की महिमा का दिव्य स्तवन है, जिसकी रचना आदि शंकराचार्य द्वारा मानी जाती है। इस स्तोत्र में सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकाल, ओंकारेश्वर, वैद्यनाथ, नागेश्वर, केदारनाथ, त्र्यम्बकेश्वर, रामेश्वर, भीमाशंकर, विश्वनाथ और घृष्णेश्वर। इन सभी पावन धामों का क्रमबद्ध वर्णन किया गया है।

मान्यता है कि श्रद्धा और भक्ति के साथ इस स्तोत्र का पाठ करने से पापों का नाश होता है, भय दूर होता है तथा मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। यहां प्रस्तुत स्तोत्र संस्कृत पाठ के साथ सरल हिंदी भावार्थ में दिया गया है, जिससे सामान्य पाठक भी इसके गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ को सहज रूप से समझ सके।

Dwadash Jyotirling Stotram: द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग स्तोत्रम् हिंदी अर्थ सहित

सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम् |
भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये || १||

श्रीशैलशृङ्गे विबुधातिसङ्गे तुलाद्रितुङ्गेऽपि मुदा वसन्तम् |
तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेकं नमामि संसारसमुद्रसेतुम् || २||

अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम् |
अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम् || ३||

कावेरिकानर्मदयोः पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय |
सदैवमान्धातृपुरे वसन्तमोङ्कारमीशं शिवमेकमीडे || ४||

पूर्वोत्तरे प्रज्वलिकानिधाने सदा वसन्तं गिरिजासमेतम् |
सुरासुराराधितपादपद्मं श्रीवैद्यनाथं तमहं नमामि || ५||

याम्ये सदङ्गे नगरेऽतिरम्ये विभूषिताङ्गं विविधैश्च भोगैः |
सद्भक्तिमुक्तिप्रदमीशमेकं श्रीनागनाथं शरणं प्रपद्ये || ६||

महाद्रिपार्श्वे च तटे रमन्तं सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः |
सुरासुरैर्यक्ष महोरगाढ्यैः केदारमीशं शिवमेकमीडे || ७||

सह्याद्रिशीर्षे विमले वसन्तं गोदावरितीरपवित्रदेशे |
यद्धर्शनात्पातकमाशु नाशं प्रयाति तं त्र्यम्बकमीशमीडे || ८||

सुताम्रपर्णीजलराशियोगे निबध्य सेतुं विशिखैरसंख्यैः |
श्रीरामचन्द्रेण समर्पितं तं रामेश्वराख्यं नियतं नमामि || ९||

यं डाकिनिशाकिनिकासमाजे निषेव्यमाणं पिशिताशनैश्च |
सदैव भीमादिपदप्रसिद्दं तं शङ्करं भक्तहितं नमामि || १०||

सानन्दमानन्दवने वसन्तमानन्दकन्दं हतपापवृन्दम् |
वाराणसीनाथमनाथनाथं श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये || ११||

इलापुरे रम्यविशालकेऽस्मिन् समुल्लसन्तं च जगद्वरेण्यम् |
वन्दे महोदारतरस्वभावं घृष्णेश्वराख्यं शरणम् प्रपद्ये || १२||

ज्योतिर्मयद्वादशलिङ्गकानां शिवात्मनां प्रोक्तमिदं क्रमेण |
स्तोत्रं पठित्वा मनुजोऽतिभक्त्या फलं तदालोक्य निजं भजेच्च ||

|| इति द्वादश ज्योतिर्लिङ्गस्तोत्रं संपूर्णम् ||

भावार्थ — द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग स्तोत्रम् हिंदी

मैं उस भगवान श्रीसोमनाथ की शरण में जाता हूं, जो भक्तों पर दया करके सुंदर और पवित्र सौराष्ट्र (काठियावाड़) में प्रकट हुए हैं, जिनके सिर पर चंद्रमा हमेशा चमकता है।

मैं उन प्रभु मल्लिकार्जुन को नमस्कार करता हूं, जो ऊंचे श्रीशैल पर्वत की चोटी पर देवताओं के बीच हंसते-हंसते रहते हैं और जो संसार सागर से पार कराने वाले एकमात्र पुल हैं।

मैं उज्जैन (अवन्तिपुरी) के महाकाल महादेवजी को नमस्कार करता हूं, जिन्होंने संतजनों को मुक्ति दिलाने के लिए वहां अवतार लिया और जिनका स्मरण अकाल मृत्यु से बचाता है।

मैं भगवान ॐकारेश्वर की स्तुति करता हूं, जो कावेरी और नर्मदा के संगम के पास, मान्धाता नगरी में बसते हैं और सत्पुरुषों को संसार से पार लगाते हैं।

मैं श्रीवैद्यनाथ को प्रणाम करता हूँ, जो पूर्वोत्तर दिशा के वैद्यनाथ धाम (चिताभूमि) में पार्वतीजी के साथ रहते हैं और जिनके चरण कमलों को देवता-असुर सभी पूजते हैं।

मैं दक्षिण के सुंदर सदंग नगर में विराजमान, भोग-विलास और सुंदर आभूषणों से सजे, सच्ची भक्ति और मुक्ति देने वाले भगवान श्रीनागनाथ की शरण में जाता हूं।

मैं केदारनाथ का स्मरण करता हूँ, जो हिमालय के पास केदार पर्वत की चोटी पर रहते हैं, मुनियों के पूज्य हैं, और देवता, असुर, यक्ष, नाग भी जिनकी पूजा करते हैं।

मैं श्रीत्र्यम्बकेश्वर की स्तुति करता हूं, जो गोदावरी तट के पवित्र देश, सह्याद्रि पर्वत की निर्मल चोटी पर निवास करते हैं और जिनके दर्शन से पाप तुरंत नष्ट हो जाते हैं।

मैं नियमपूर्वक श्रीरामेश्वर को प्रणाम करता हूं, जिन्हें भगवान श्रीराम ने ताम्रपर्णी और सागर के संगम पर अपने बाणों से पुल बनाकर स्थापित किया।

मैं श्रीभीमशंकर को प्रणाम करता हूं, जिन्हें डाकिनी-शाकिनी और प्रेतगण निरंतर सेवा करते हैं और जो भक्तों का सदा भला करते हैं।

मैं काशी के आनन्दवन में वास करने वाले, सारे पापों का नाश करने वाले, अनाथों के नाथ श्रीविश्वनाथ की शरण में जाता हूँ, जो खुद ही आनंद के स्रोत हैं।

मैं घृष्णेश्वर नाम के ज्योतिर्मय भगवान शिव की शरण में जाता हूं, जो इलापुर के सुंदर मंदिर में विराजमान हैं, उदार हैं और सारी दुनिया के पूज्य हैं।

अगर कोई भक्तिपूर्वक इन बारहों ज्योतिर्लिंगों के स्तोत्र का पाठ करे, तो उसे वैसे ही फल मिलते हैं जैसे इनके दर्शन से मिलते हैं।

इसी के साथ श्रीमद् शंकराचार्य द्वारा रचित द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र पूरा होता है।