आज सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक है यह मेला165 साल पुराना है इतिहास बाड़ी. सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक बारह भाई मेला 165 साल से क्षेत्र यमुना-जमुना तहजीब की मिसाल कायम किए हुए है। पूर्वी राजस्थान का यह सबसे बड़ा मेला इस बार 24 मार्च को निकलेगा।
जाति-धर्म से परे 12 दोस्तों ने शुरू किया था बारह भाई का मेला
आज सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक है यह मेला
165 साल पुराना है इतिहास
बाड़ी. सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक बारह भाई मेला 165 साल से क्षेत्र यमुना-जमुना तहजीब की मिसाल कायम किए हुए है। पूर्वी राजस्थान का यह सबसे बड़ा मेला इस बार 24 मार्च को निकलेगा। यह बात उस समय की है, जब धौलपुर रियासत पर महाराजा राणा कीरत सिंह के बाद महाराजा राणा भगवत सिंह शासन करते थे, जब बाड़ी धौलपुर रियासत का एक अभिन्न अंग था।
बारह दोस्तों ने निकाला था यह मेला, तभी से पड़ा इसका नाम श्री बारह भाई मेला
शहर के बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि 1857 के प्रथम स्वत्रंता संग्राम की चिंगारी पूरे देश में भडक़ रही थी और देश भक्त राजा और सैनिक अंग्रेजों से लोहा ले रहे थे। उसी समय शहर के बारह दोस्तों ने मेले को निकालने का अडिग संकल्प ले लिया। कहते हैं कि इन बारह भाइयों में किसी प्रकार का जाति बंधन नहीं था। जनता तो जनता राजा महाराजा भी इन दोस्तों को पूरा मान सम्मान देते थे। इन बारह दोस्तों में ब्राह्मण, वैश्य, राजपूत, गौड, प्रजापति, कायस्थ, जाटव, कोली, हरिजन, सुनार, जाट, अहीर तो शामिल थे, साथ ही एक मुसलमान भी था।
आज भी प्रेम के प्रतीक लैला मजनू की निकलती है सवारी
मेले में पहले लैला और मजनू की सवारी एक ही ऊंट पर बैठकर निकलती थी, मगर बदलते परिवेश में अब दोनों की अलग-अलग झांकी निकाली जाती है।
मेला पर आते थे रिश्तेदार और बहन बेटी
मेला की शोभायात्रा को देखने के लिए शहर के लोग अपने रिश्तेदार और बहन बेटियों को बुलाते थे और घरों तथा दुकानों की छतों पर भारी भीड़ जुटती थी, लेकिन समय के बदलते प्रवेश के कारण आज ग्रामीण से आ रहे मेला वालों को बैठने के लिए जगह के अभाव में संख्या में कमी होती जा रही है।
एक लोटे से पिया सभी भाइयों ने पानी
एक बार जगनेर के ग्वाल बाबा के मेले को देखने यह बारह भाई गए, जहां जगनेर वासियों ने इनकी आवभगत की और एक शर्त रखी कि सभी को एक लोटे से पानी पीना पड़ेगा और शर्त को शिरोधार्य कर सभी ने एक लोटे से पानी पिया।
बारह भाई मेले की इन बुजुर्गों ने डाली नींव
शहर में विगत 164 वर्षों से निकलते आ रहे बारह भाई मेले में अपना खून पसीना एक करने वाले स्वर्गीय केदारनाथ मंगल, स्व. गोविंद गुरु कपरेला, स्व. पूर्व चेयरमैन छोटे खा,ं स्व. बाबूलाल चंसोरिया, स्व. सलकी पुजारी, स्व. हरविलास मंगल बजाज, स्व. जवाहर लाल वर्मा पार्षद, स्व. हरविलास मंगल शिक्षाविद, स्व. रामप्रसाद सर्राफ, स्व. नंदीलाल सर्राफ, स्व. राम भरोसी लाल बंसल, स्व. शिवकुमार पांडे पाराशर, स्व. नवल किशोर भारद्वाज, स्व. हसुआ सिंह परमार सहित अनेक नागरिकों एवं बुजुर्ग शामिल हैं। इन्होंने मेला की आन, बान व शान को कमजोर नहीं होने दिया। इनका कहना है
बारह भाई मेले को देखने के लिए बाड़ी उपखंड के ग्रामीण क्षेत्रों से ग्रामीण जन शहर में आ आकर घोड़े, ऊंट, बैलगाड़ी मैं बैठ-बैठ कर स्वरूपों को निकालने में पूरी मदद करते थे।अजमेर सिंह यादव, संस्थापक, मेला कमेटी बाड़ी।
मेला शान, बान और आन का प्रतीक है। इसमें राजा महाराजा भी योगदान देते थे। प्राचीन काल से ही यह मिला अनवरत रूप से आज भी सभी जाति धर्म के लोगों के सहयोग से निकलता आ रहा है।राजकुमार भारद्वाज, मेला संयोजक
कुछ अपवाद को छोडकऱ कभी बंद नहीं हुआ। मेला बाड़ी शहर में आज भी सांप्रदायिक सौहार्द है। कोरोना काल में अवश्य यह मेला नहीं निकला। आज भी सभी समाज के लोग एक जाजम पर बैठकर भाई चारा और सद्भाव की अनूठी मिसाल कायम कर रहे हैं।दानसिंह प्रजापति, संस्थापक, मेला कमेटी, बाड़ी। मेला की ध्वजा स्थापना के साथ ही मेला प्रारंभ हो जाता है। होली की दौज पर श्री राधा कृष्ण की झांकी समिति द्वारा निकाली जाती है।जगदीश बंसल कालम, संस्थापक, मेला कमेटी।
पूर्व में शहर के संभ्रांत नागरिक अपने-अपने हाथों से स्वरूपों को सजा कर अपने कन्धों पर बिठाकर झांकिया में शामिल करने के लिए ले जाने के लिए उत्सुक रहते थे।सत्यदेव चंसोरिया, संस्थापक, मेला कमेटी। मेले के अंत में चलने वाली भगवान श्री राम लक्ष्मण माता जानकी की सवारियों को अपने अपने कंधों पर उठाकर पूरे नगर का भ्रमण कराते थे। साथ ही इनके आगे आगे शंख, झालर और मजीरा को हाथों से बजा कर राम मय वातावरण उत्पन्न कर देते थे।त्रिलोक चंद कनोआ, संस्थापक, मेला कमेटी।