
Dholpur,सरमथुरा. भारतीय संस्कृति में सुहागन महिलाओं के सबसे बड़े पर्व करवा चौथ के त्यौहार को लेकर मुस्लिम समुदाय के घर गुलजार है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत के अवसर पर सुहागन महिलाएं पूजा में मिट्टी के करेबा का उपयोग करती है। लेकिन कस्बा में यह परंपरा बिल्कुल अलग है। यहां महिलाएं मिट्टी के बजाय शक्कर के करेबा खरीदना ज्यादा पसंद करती हैं। यही वजह है कि मुस्लिम समुदाय के कारीगर करवाचौथ से पहले शक्कर के करेबा बनाने में व्यस्त हैं।
सबसे खास बात यह है कि कस्बा में इन शक्कर के करेबा को मुस्लिम कारीगर हाथों से तैयार करते हैं। यहां कई स्थानीय मुस्लिम परिवार ऐसे हैं, जो इन शक्कर के करेबा को बनाते हैं। शुद्ध चासनी से बने इन शक्कर करेबा को महिलाएं शगुन के तौर पर मिट्टी के करवों से भी ज्यादा महत्व देती हैं। करवा चौथ पर इनकी मांग इतनी जबरदस्त रहती है कि यहां के मुस्लिम कारीगर त्यौहार आने से पहले ही बड़ी मात्रा में इन करेबा को बनाना शुरू कर देते हैं।
-परिवार की महिलाएं और बच्चे सभी व्यस्त
शक्कर के इन करेबा को पीढ़ियों से बनाते आ रहे मुस्लिम कारीगर अनवर खान बताते हैं कि शक्कर के सभी करेबा यहां मुस्लिम कारीगर ही तैयार करते हैं। जो करवाचौथ पर सगुन के लिए उपयोग होते हैं। बताते हैं कि हिंदू महिलाएं इन्हें करवा चौथ के पर्व पर खरीदकर व्रत खोलना ज्यादा पसंद करती है। करवाचौथ के लिए कस्बा में तीन प्रकार के करेबा बनाए जाते हैं। इन तीनों में फर्क सिर्फ आकार, डिजाइन का होता है। इनमें एक छोटा साइज, दूसरा मीडियम और तीसरा बड़ा साइज होता है।
-लकड़ी के सांचे में बनाए जाते हैं करेबा
शहर में शक्कर के करेबा बनाने वाले कारीगर अनवर खान बताते हैं कि इसे बनाने के लिए सबसे पहले शक्कर की चासनी बनाई जाती है। फिर उसके बाद इसके लिए एक लकड़ी के सांचे का उपयोग किया जाता है, जिसमें चासनी डाली जाती है। काफी मेहनत के बाद यह करेबा तैयार होता है और इसे बनाते समय साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है, क्योंकि इसका उपयोग पूजा के लिए होता है।
-शक्कर की मंहगाई ने करेबा की मिठास की फीकी
मंहगाई के दौर में करवाचौथ पर करेबा की मिठास फीकी हो गई है। बाजारों में अमूमन 80-90 रूपये किलो में शक्कर के करेबा मिल जाते थे लेकिन इस बार बाजार में 120 रूपये किलो का भाव सुनकर महिलाएं मिट्टी के करेबा ज्यादा पसंद कर रही है। हालांकि शक्कर के करेबा का स्वाद मीठा होने के कारण इसे शगुन के रूप में प्रसाद में भी उपयोग किया जाता है।