
धौलपुर. जिम्मेदारों की अनदेखी के कारण एशिया की स्वच्छ नदियों में शुमार चम्बल नदी अशुद्ध हो रही है। कारण शहर से निकलने वाले गंदे पानी का नाला चंबल में मिल रहा है। जिससे न चंबल के पानी में गंदगी समा रही है, बल्कि जलीय जीवों के जीवन पर भी संकट आन पड़ा है, जिले लेकर पर्यावरण पे्रमी भी कई बार इसको लेकर चिंता जता चुके हैं, लेकिन उसके बाद भी जिला प्रशासन और न ही परिषद प्रशासन को यह नाला दिख रहा।
नदी, तालाब, कुंआ पोखरों को बचाने सरकार का वंदे गंगा जल संरक्षण अभियान सिर्फ कागजों तक ही सीमित दिख रहा है। अगर शासन, प्रशासन अभियान को लेकर मुश्तैद होती तो शहर से लेकर जिले भर में पानी की कमी नहीं होती और जो पानी है भी वह अशुद्ध होने की कगार पर नहीं पहुंचता। राजस्थान के धौलपुर और मध्य प्रदेश के मुरैना जिले की सीमा से होकर गुजर रही एशिया महाद्वीप की प्रदूषण मुक्त नदी चम्बल में धौलपुर शहर का गंदा पानी गिर रहा है, नाला छोटा मोटा भी नहीं बल्कि बड़ा नाला होने के कारण उससे हजारों गैलन गंदा और बदबूदार पानी चंबल के पानी में समाहित हो रहा है। देखा जाए तो चंबल के पानी का धौलपुर, भरतपुर, करौली, सवाई माधोपुर के साथ अन्य जिलों के लोग इसका उपयोग करते हैं, लेकिन समय के साथ अब चम्बल का भी पानी शुद्ध नहीं रहा। चम्बल नदी के शुद्ध पेयजल की बात कहना अब बेमानी साबित हो रही है।
घडिय़ालों के लिए मुफीद चंबल का पानी
चंबल नदी देश की सबसे साफ नदियों में शुमार है। यही कारण है कि चंबल नदी को राष्ट्रीय घडिय़ाल अभ्यारण संरक्षित क्षेत्र घोषित किया था, क्योंकि घडिय़ाल स्वच्छ पानी में ही निवास करते हैं। चम्बल नदी में घडिय़ालों के साथ मगरमच्छ, डॉल्फिन, कछुआ और अन्य जलीय जीव विचरण कर रहे हैं। साथ ही बड़ी संख्या में देशी विदेशी पक्षी यहां आते हैं और जिनमें इंडियन स्कीमर भी शामिल है, लेकिन चम्बल नदी को नाले के पानी ने गंदा कर रखा है। चंबल नदी में बढ़े नाले के माध्यम से पुराने शहर का पानी जा रहा है, लेकिन इस ओर सिस्टम का कोई ध्यान ही नहीं है। गंदा पानी से चंबल के पानी में ऑक्सीजन की माात्रा अब धीरे-धीरे कम होती जा रही है। बता दें कि चम्बल नदी में वर्तमान समय में दो हजार 938 घडिय़ालों के साथ एक हजार 512 मगरमच्छ और १55 डॉल्फिन, कछुआ समेत अन्य जलीय जीव विचरण कर रहे हैं।
बजरी प्रतिबंध पर ध्यान...गंदे पानी को भूले
एक ओर तो सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय घडिय़ाल चंबल सेंचुरी को बचाने के लिए चंबल नदी के तटों से बजरी का खनन रोकने के आदेश दे रखे हैं, जबकि दूसरी और चम्बल के पानी को अशुद्ध किया जा रहा है। मामला सिर्फ धौलपुर तक ही सीमित नहीं है, अपितु कोटा क्षेत्र में भी कई नालों का गंदा पानी चंबल के स्वच्छ पानी को गंदा कर रहा है। जिससे जलीय जीवों के साथ आमजन के जीवन पर खतरा पैदा होने की संभावना बनी हुई है। देश की सबसे साफ और मीठे पानी में शुमार चम्बल नदी राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कई जिलों से होकर यमुना नदी और उसके बाद गंगा में मिल जाती है। चम्बल नदी को नमामि गंगे प्रोजेक्ट में शामिल किया है। चम्बल नदी का पानी मीठा और फिल्टरयुक्त है। साथ ही फ्लोराइड की मात्रा नाम मात्र की है। भारत सरकार ने राष्ट्रीय चम्बल घडिय़ाल अभ्यारण्य साल 1978 में स्थापित कर दिया था और जब से नदी में घडिय़ालों का लालन पालन लगातार जारी हैं। एशिया महाद्वीप की प्रदूषण मुक्त नदी चम्बल होने के कारण इसमें घडिय़ाल, डॉल्फिन, मगरमच्छ, कछुआ समेत अन्य जलीय जीव विचरण कर रहे हैं। दुर्लभ डायनासोर प्रजाति के घडिय़ाल देश दुनिया से विलुप्त प्राय हैं, ऐसे में चंबल नदी में इनकी अच्छी संख्या होना सुखद है।
नाले का पानी गिर रहा चम्बल में
धौलपुर नगर परिषद ने पुराने शहर के नाले के गंदे पानी के लिए एसटीपी प्लांट का प्रोजेक्ट राजस्थान सरकार को भेजा था। जिसकी अनुमानित लागत 68.03 लाख रुपए थी, लेकिन सरकार ने प्लांट के लिए पैसा मंजूर नहीं किया और जब से लगातार नाले का गन्दा पानी चम्बल नदी में गिर रहा है। चम्बल नदी में एक ही बड़ा नाला बहुत पहले से जुड़ा हुआ है। यह नाला पुराने शहर से चम्बल नदी तक जाता है। पुराने शहर में लगभग सभी घरों में सीवरेज कनेक्शन हो चुके हैं। सीवर लाइन के जरिए पानी एसटीपी प्लांट में जाता है और सागरपाड़ा पर तीन एमएलटी प्लांट बना हुआ है और वहां से भी पानी चम्बल नदी में गिर रहा है।