शिक्षा का अर्थ व्यापक है। शिक्षक की भूमिका उससे भी व्यापक है। शिक्षा का मतलब किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि बच्चों का समग्र व्यक्तित्व विकास है। जब गुरु-शिष्य परंपरा पर सवाल खड़े किए जा रहे हों तब शाप्रावि के सहायक शिक्षक सतंजय मिश्रा ने नवाचार के नए आयामों के साथ शिक्षा और शिक्षक की भूमिका को सार्थक किया है। इस कार्य में विद्यालय प्रभारी मंगल सिंह मौर्य कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग कर रहे हैं।
नौ वर्ष पूर्व जब मिश्रा की पदस्थापना शाप्रावि बंधा में हुई तो वहां शिक्षा व्यवस्था बदहाल थी। बच्चे स्कूल आते नहीं थे। कत्र्तव्यबोध से बंधे सतंजय को यह नागवार गुजरा। उन्होंने प्रभारी मंगल सिंह मौर्य के साथ गांव में संपर्क कर बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया। धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढऩे लगी। आज स्कूल में 70 बच्चे हैं और औसतन 60 बच्चे उपस्थित हो जाते हैं।
बच्चे स्कूल आने के लिए जिद करें ऐसा माहौल निर्मित करने के लिए नवाचार किए गए। इसमें जहां बालसभा की शुरुआत हुई, वहीं हर महापुरुष की जयंती मनाई जाने लगी। इसमें गांव वालों को भी शामिल किया गया। गांव वालों का विश्वास जीतने के लिए नवाचार की शुरूआत नमस्कार से हुई। विद्यालय प्रभारी मौर्य बताते हैं कि शिक्षक नमस्कार करने लगे तो गांव वालों ने भी यह परंपरा शुरू कर दी।
सतंजय मिश्रा के प्रयासों से अब हर शनिवार को बालसभा और उसमें प्रश्नमंच, कक्षा के हिसाब से शिक्षा के अलावा समाचार-पत्र व पत्रिकाएं पढ़वाने के साथ ही प्रतिदिन सुविचार भी लिखा जाता है।
पांचवीं कक्षा के छात्र गौरव कुशवाह कहते हैं कि स्कूल में हमें पढ़ाने के साथ रबर, कटर, पेंसिल व कोरे कागज भी मिलते हैं। शिक्षक हमारे बीच में जमीन पर ही बैठकर पढ़ाते हैं तो डर नहीं लगता। इसी कक्षा की छात्रा अंजलि कहती हैं हमारे सर खेल-खेल में सिखाते हैं। लवकुश व सतेंद्र का भी यही अनुभव है।
झाड़ू भी लगाते हैं बर्तन भी मांजते हैं
शाप्रावि बंधा के शिक्षकों ने बच्चों और अपने बीच की दूरी कम की। इसके लिए उन्होंने एक नई परंपरा भी शुरू की है। शिक्षक सतंजय मिश्रा और प्रभारी मंगल सिंह मौर्य अब एमडीएम के बच्चों के जूठे बर्तन भी धोते हैं।
हालांकि यह काम वे रोज नहीं करते, लेकिन बर्तन गंदे दिखने पर सप्ताह में एक बार अनिवार्य व जब बर्तन गंदे दिखें तब करते हैं। गुरु के साथ पालकों जैसा व्यवहार अपनाते हुए वे हर शुक्रवार बच्चों के नाखून कटवाते हैं वहीं एमडीएम के पहले और ठीक बाद साबुन से हाथ धुलवाए जाते हैं।
विद्यालय में और क्या किए नवाचार
सतंजय मिश्रा सहायक शिक्षक शाप्रावि बंधाकापुर ने बताया कि कक्षा के अनुरूप शिक्षा के साथ बच्चों का व्यक्तित्व विकास भी हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। विद्यालय प्रबंधन के साथ मिलकर कुछ नवाचार किए जिनके परिणाम स्वरूप गांव में शिक्षा का माहौल बना और पढऩे योग्य सभी बच्चे स्कूल आने लगे। बच्चे गंदे बर्तनों में भोजन न करें और स्वच्छता के प्रति समर्पित हों इसलिए झाड़ू भी साथ में लगाते हैं और बर्तन भी धोते हैं।