-महाराजा भगवंत सिंह और पे्रमिका गजरा के प्यार को दर्शाता है मकबरा -जिम्मेदारों की उपेक्षाओं का शिकार शहर की ऐतिहासिक धरोहर धौलपुर. कई ऐसी धरोहरें और पे्रम कहानियां हैं जो विश्वास और प्यार का प्रतीक हैं। महाराणा स्कूल स्थित गजरा महल भी उन्हें प्रीतकों में से एक है जो सालों से प्रेम के स्वर्णिम युग […]
-महाराजा भगवंत सिंह और पे्रमिका गजरा के प्यार को दर्शाता है मकबरा
-जिम्मेदारों की उपेक्षाओं का शिकार शहर की ऐतिहासिक धरोहर
धौलपुर. कई ऐसी धरोहरें और पे्रम कहानियां हैं जो विश्वास और प्यार का प्रतीक हैं। महाराणा स्कूल स्थित गजरा महल भी उन्हें प्रीतकों में से एक है जो सालों से प्रेम के स्वर्णिम युग को अपने अंदर संजोए खड़ा है। लेकिन पे्रम की यह मूरत आज अनेदखी और जिम्मेदारों की अकर्मण्डयता का शिकार होकर रह गया है, जो आज सिर्फ अपने अस्तित्व को खोता जा रहा है।
गजरा महल को ‘धौलपुर का ताजमहल’ कहा जाए तो कोई अश्यिोक्ति नहीं होगी, क्योंकि इसमें भी मोहब्बत, विश्वास और समर्पण का भाव व्याप्त है। जिसे एक महाराज ने नृतकी गजरा के पे्रम को सदा जीवंत रखने के लिए बनवाया था। बताया जाता है कि इस महल का निर्माण डेढ़ सदी पूर्व धौलपुर के महाराज भगवंत सिंह ने अपनी पे्रमिका गजरा के पे्रम कराया था। जिसका राजस्थान के इतिहासकार श्यामलदास ने अपनी पुस्तक वीर विनोद में एक अध्याय धौलपुर के अहदनामे में गजरा का उल्लेख किया है। धौलपुर की ऐतिहासिक विरासतों में से एक गजरा महल जिम्मेदारों की उपेक्षाओं का शिकार होकर रह गया है और आज यह प्यार का प्रतीक सिर्फ खंडहर बनकर रह गया है। जहां लोगों का आना-जाना भी पूर्ण रूप से बंद हो चुका है।
प्रेम की अमिट निशानी बनाना चाहते थे महाराज
इतिहासकार अरविद शर्मा बताते हैं कि भगवंत सिंह अपनी प्रेयसी गजरा के लिए एक अमिट प्रेम निशानी बनाना चाहते थे जिसे लोग उनके पे्रम के रूप में सदा याद करें। जिसके बाद इस इमारत को ताजमहल जैसी सूरत देनी की कोशिश की गई। इमारत को बनाने के लिए नृसिंह बाग का चयन किया गया। महाराजा भगवंत सिंह चाहते थे कि इसी इमारत में उनकी और गजरा की कबे्रं भी बनाईं जाएं। गजरा और महाराजा की मृत्यु के बाद दोनों को उसी इमारत में दफनाया गया। जिसे लोग अब गजरा का मकबरा नाम से जानते हैं। जिसमें अब महाराना स्कूल का संचालन हो रहा है।
मुशायरे में हुआ पहला दीदार
इतिहासकार बताते हैं कि महाराजा भगवंत सिंह ने गजरा का पहला दीदार मुशायरा के दौरान किया था। उस समय दरबार में एक मुशायरा का आयोजन किया गया था। गजरा अत्यंत सुंदर, मोहक और नृत्य कलाओं में पारंगत थी। यही वो पल था जब महाराजा ने गजरा को पहली बार देखा। और देखते ही वह उनके प्रेम में डूब गए। और दोनों एक दूसरे की मोहबत में कैद हुए। भगवंत सिंह और गजरा के बीच पहली नजर का यह प्रेम धीरे-धीरे परवान चढ़ता गया।
ताजमहल की तर्ज पर इमारत का निर्माण
महाराजा इस ऐतिहासिक इमारत को प्यार का प्रतीक माने जाने वाले ताजमहल की तर्ज पर कराना चाहते थे। जिसके लिए उन्होंने भरकस प्रयास किया। और इमारत में लाल और सफेद पत्थर का प्रयोग किया गया। इस इमारत में चारों ओर मीनारें, बीच के हिस्से चौकारें, बुलंद दरवाजा, चारों तरफ छोटे-छोटे महराब और मध्य में मकबरा स्थापित किया गया। जब इस मकबरे का काम अपने अंतिम चरण में था तो किन्हीं कारणों से कार्य रुकवा दिया। जिससे इस मकबरे का गुम्बद नहीं बन पाया और यह धौलपुर का ताजमहल गुम्बद के अभाव में अधूरा रह गया। 1859 के आसपास गजरा का इंतकाल हो गया। लेकिन प्यार की यह अनूठी निशानी आज भी एक अमर प्रेम की कहानी बयां करती नजर आती है।