Tradition in Rajasthan : सरमथुरा के डांग क्षेत्र में पलायन की वर्षों पुरानी प्रथा...
धौलपुर/सरमथुरा।
देवभूमि उत्तराखण्ड में सर्दियों के आगमन के साथ ही चारों धामों बद्रीनाथ ( Badrinath ) - केदारनाथ ( Kedarnath ) - गंगोत्री ( Gangotri ) - यमनोत्री ( Yamunotri ) के मंदिरों के कपाट बंद हो जाते है उसी तरह से राजस्थान में भी एक ऐसा क्षेत्र है जहां गर्मी के आगमन के साथ ही लोगों के घरों के कपाट (दरवाजे) कुछ महीनों के लिए बंद हो जाते है। हालांकि यहां मंदिरों के नहीं, लोगों के घरों के दरवाजों पर कुछ समय के लिए ताले लग जाते हैं। इसका कारण भी बहुत ही रोचक है।
दरअसल, यहां गर्मियों के आगमन के साथ ही पानी की समस्या ( Water crisis s in Rajasthan ) बढ़ जाती है। जिससे लोगों को पीने के पानी ( Water problem m in Rajasthan ) के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। जिस कारण लोग अपने-अपने घरों पर ताले लगा कर यहां से पलायन कर जाते हैं और बारिश की शुरूआत के साथ वापस अपने घरों को लौट आते हैं।
अब प्रदेश में बारिश शुरू होते ही एक बार फिर से क्षेत्र के गांवों में रोनक लौटने लगी है। गर्मी में पानी की तलाश को घरों पर ताले लगाकर पलायन कर चुके धौलपुर ( Dholpur ) के डांग क्षेत्र के दर्जनों गांव के लोगों ने पहली बारिश के बाद फिर से घर वापसी शुरू कर दी है। कुछ दिन पहले हुई बारिश के बाद चार माह से सूने पड़े गांव के रास्तों पर फिर से रौनक नजर आने लगी है। जिले के सरमथुरा क्षेत्र के डांग इलाके में दो दर्जन से अधिक गांवों के बाशिंदे कई पीढिय़ों ( tradition in rajasthan ) से पेयजल संकट से जूझते हुए प्रतिवर्ष पलायन करने को मजबूर होते हैं। सरकारी स्तर पर राहत देने की कोई योजना मूर्त रूप नहीं लेने से जन-जीवन प्रतिवर्ष गर्मियों में अस्त व्यस्त हो जाता है।
एक-दो लोग रुकते हैं सुरक्षा को
गांव गोलारी की महिलाओं ने बताया कि गांव के अधिकांश लोग गर्मी शुरू होते हुए अपने परिवार और पशुओं को लेकर यहां से पलायन कर जाते है। ऐसे में रखवाली के लिए गांव में केवल एक दो लोग ही रह जाते हैं। इन लोगों की ओर से समय-समय पर सपंर्क करते हुए बारिश के बारे में जानकारी दी जाती है। बारिश में जलाशयों में पानी भरने की जानकारी मिलते ही स्थानीय लोगों का पहुंचना शुरू हो जाता है।
पानी के लिए पलायन की मजबूरी
गांव गोलारी इलाके में गुर्जर बाहुल्य दो दर्जन से अधिक गांवों में पशुपालन ही प्रमुख धंधा है। पानी कमी के चलते होली के बाद इन गांवों के अधिकांश घरों में ताले लग जाते हैं। इसके प्रमुख कारण क्षेत्र में कोई बड़ा जलाशय अथवा पानी के स्रोत का ना होना है। ग्रामीणों का मुख्य धंधा पशुपालन होने से ये पशुओं व बच्चों को साथ लेकर पानी की प्रचुर मात्रा वाले स्थानों की ओर पलायन कर जाते हैं। इनमें समीपवर्ती पार्वती बांध के आसपास या उत्तर प्रदेश में यमुना नदी के किनारे बसे गांव इनका प्रमुख ठिकाने रहते हंै। वहां इधर-उधर भटकते हुए अपने परिवार व पशुओं के साथ 4 महीने का ग्रीष्म ऋ तु वाला समय व्यतीत करते हैं। यह जीवन चक्र कई पीढिय़ों से चला आ रहा है।
योजना का लाभ नहीं ( Rajasthan Govt Water Planning )
राज्य सरकार की 82 ग्राम व 61 मजरों के लिए पार्वती बांध से पानी लेकर इस क्षेत्र को देने की योजना में यह क्षेत्र भी शामिल है। इससे पूरे गांव के लिए एक पब्लिक सप्लाई पॉइंट, कैटल वाटर टैंक बना रखे हैं जिन में मात्र 10 मिनट के लिए पानी आता है।
इन गांवों में लौटे ग्रामीण
गौलारी, बल्लापुरा, बहेरी पुरा,गोलीपुरा, झल्लू की झोर, मथाया, डोमपुरा, नाहरपुरा, अहीर की गुरहाकी, महुआ की झोर, कोटला, बोहरेका पुरा, खोटावाई, डांगरीपुरा, जारहेला, धौरीमाटी, विजलपुरा, आदि गांवों में ग्रामीण लौटने लगे हैं।