रोग और उपचार

B Alert – मधुमेह से बढ़ती है हार्ट अटैक की आशंका

जो धमनियां पतली होती हैं वे डायबिटीज होने के शुरुआती कुछ सालों में मोटी हो जाती हैं जिससे हार्ट अटैक का खतरा रहता है

2 min read
Jun 29, 2019
diabetes risk
B Alert - मधुमेह से बढ़ती है हार्ट अटैक की आशंका

मधुमेह से हार्ट अटैक की आशंका बढ़ाती क्याेंकि सामान्य से ज्यादा शुगर का स्तर रक्तधमनियों को धीरे-धीरे बाधित करने लगता है। खासकर जो धमनियां पतली होती हैं वे डायबिटीज होने के शुरुआती कुछ सालों में मोटी हो जाती हैं जिससे हार्ट अटैक का खतरा रहता है। यह एक तरह से प्री-डायबिटिक लक्षण होते हैं। यदि डायबिटीज के दौरान ब्लड शुगर लेवल नियंत्रित नहीं हो पाता तो कई बार इससे आंख, किडनी आदि के अलावा अन्य अंगों की बेहद पतली नसों पर असर होने लगता है जिससे अप्रत्यक्ष रूप से अंगों की कोशिकाएं भी क्षतिग्रस्त होने लगती हैं।

टाइप-1 :
इसे जुवेनाइल डायबिटीज भी कहते हैं जिसमें बचपन से ही बच्चे के शरीर में इंसुलिन की बीटा कोशिकाएं बेकार हो जाती हैं जिससे इंसुलिन नहीं बन पाता। ऐसे में मरीज को इंसुलिन की पूर्ति पूर्ण रूप से नहीं हो पाती। मरीज को इंजेक्शन या दवा से इंसुलिन की खुराक दी जाती है।

टाइप-2 :
यह उम्र के बढऩे के साथ खराब जीवनशैली के कारण होती है। इसमें पेन्क्रियाज इंसुलिन तो बनाता है लेकिन शुगर को ऊर्जा में बदलकर शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंचाने में असमर्थ हो जाता है। इसके लिए मरीज को दवाएं देकर पेन्क्रियाज की इंसुलिन बनाने की क्षमता को बढ़ाया जाता है।

प्रमुख लक्षण :
दोनों प्रकार की डायबिटीज यानी टाइप-1 और टाइप-2 में मरीज के लक्षण लगभग समान होते हैं। फर्क सिर्फ उनकी गंभीरता का होता है। शुगर ज्यादा होने पर भूख और प्यास ज्यादा लगना, बार-बार यूरिन आना, धुंधला दिखाई देना, पैरों में जलन या किसी भी तरह के घाव को भरने में समय लगने जैसी दिक्कतें सामने आती हैं।

35 पार जांच कराना
आमतौर पर एक स्वस्थ व्यक्ति को 35 साल की उम्र के बाद सेहत संबंधी जांचें जैसे ब्लड टैस्ट, ब्लड शुगर टैस्ट आदि करवानी चाहिए ताकि अगर कोई आशंका हो भी तो उसके बचाव के तरीके और समय पर इलाज को अपनाया जा सके। इसके अलावा ऐसे व्यक्ति जिनमें डायबिटीज का खतरा रहता है उन्हें 20 साल की उम्र से ही कोलेस्ट्रॉल, किडनी और हृदय से जुड़ी प्रमुख जांचें कराने की सलाह दी जाती है। साथ ही गर्भावस्था में भी रोग की आशंका होने पर संबंधित जांचें करवा लेनी चाहिए।

इलाज : दवाओं से स्थिति करते नियंत्रित
मरीजों को ऐसी दवाएं देते हैं जो पेन्क्रियाज की कार्यप्रणाली को सुधारने के साथ सामान्य मात्रा में इंसुलिन बनाने में मदद करती हैं। कुछ मामलों इंसुलिन रेसिस्टेंस की स्थिति में इंसुलिन सेंसिटाइजर देते हैं जिनका काम ब्लड शुगर के स्तर को सामान्य कर अंगों द्वारा इंसुलिन प्रयोग में लेने की क्षमता को बढ़ाना होता है।

न्यू ट्रीटमेंट
इन दिनों डायबिटीज के टाइप-2 मरीजों को सोडियम ग्लूकोज को-ट्रांसपोर्टर-2 (एसजीएलटी-2) इंहेबिटर्स भी देते हैं। इसे सही डाइट और नियमित व्यायाम के साथ लेने की सलाह दी जाती है ताकि किडनी के जरिए अतिरिक्त शुगर यूरिन के रूप में बाहर निकल सके। यही इस दवा का मुख्य काम भी है। कुछ मरीजों में अन्य रोगों के अनुसार इसके दुष्प्रभाव भी देखे जा सकते हैं इसलिए डॉक्टरी सलाह के बाद ही इसे लेने के लिए कहते हैं।

Published on:
29 Jun 2019 06:09 pm