
Twins Pregnancy: गर्भावस्था में पेट के निचले भाग व पीठ के आसपास दर्द होना सामान्य है लेकिन यदि गर्भस्थ शिशु जुड़वां हों तो यह दर्द सामान्य की तुलना में अधिक हो सकता है। ऐसे में महिला को डाइट से लेकर हर गतिविधि व सभी जरूरी जांचों के दौरान खास देखभाल बरतनी चाहिए।
इन पर ध्यान दें -
गर्भधारण से पहले, इसके दौरान और प्रसव के बाद, इन तीन स्थितियों में विशेषज्ञ चार खास बातों का ध्यान रखने की सलाह देते हैं। जैसे जरूरी जांचें, जटिलताओं- लक्षणों की जानकारी, डाइट व पूरा आराम।
तिगुनी डाइट -
महिला को तिगुनी डाइट लेनी होती है ताकि मां के शरीर के जरिए गर्भस्थ शिशु को पोषक तत्त्वों की पूर्ति होती रहे। डाइट में आयरन, प्रोटीन, फॉलिक एसिड, विटामिनयुक्त चीजें जैसे मौसमी फल, सब्जियां और दूध आदि लें।
जरूरी जांचें -
सोनोग्राफी से गर्भ में जुड़वां शिशु का पता चलने के आधार पर महिला की दिनचर्या तय होती है। इसमें आराम, खानपान, नियमित बीपी, ब्लड व अन्य जांचें शामिल हैं। समय पूर्व लेबर पेन होने पर यूट्राइन रिलैक्सिंग ड्रग दी जाती हैं।
विशेषज्ञ की राय-
यदि महिला पहले से किसी रोग से ग्रसित है या फिर जुड़वां बच्चे होने के कारण किसी एक शिशु का विकास पूरी तरह नहीं हो पा रहा हो तो ऐसे में विशेषज्ञ गर्भवती को विशेष दवाएं व परहेज संबंधी जानकारी देते हैं।
महिला का ब्लड प्रेशर बढ़ना या खून की कमी।
बच्चेदानी का आकार या लेबर पेन बढ़ने से प्री-मेच्योर या सिजेरियन डिलीवरी।
महिला के साथ गर्भस्थ शिशुओं में भी पोषक तत्त्वों (विशेषकर प्रोटीन व आयरन) की कमी।
गर्भस्थ शिशु को ऑक्सीजन न मिलने से या बच्चों के आपस में लॉक होने पर प्रसव के दौरान जटिलताएं।
डिलीवरी के समय सामान्य से ज्यादा ब्लीडिंग होना (पीपीएच यानी पोस्टपार्टम हेमरेज)।
बच्चेदानी का आकार व वजन बढ़ने से ब्लीडिंग।
प्लेसेंटा का आकार बढ़ने से इसका अपनी जगह से नीचे खिसक जाना, जिससे रक्तस्त्राव हो सकता है। मेडिकल भाषा में इसे प्लेसेंटा प्रीविया कहते हैं।
गर्भ में जगह की कमी से शिशुओं की पोजीशन में बदलाव।
शरीर को आराम : इस स्थिति में सातवें माह से महिला का वजन सामान्य से दोगुना हो जाता है। ऐसे में उसे अधिक आराम करना चाहिए।