
नई दिल्ली: ठप्प पड़ी अर्थव्यवस्था और घरों कैद लोग यानि लॉकडाउन हालात में भारत के वित्तीय वर्ष 2020-21 की शुरूआत हुई, और वित्तीय वर्ष के पहले ही दिन इस बात का अहसास हो गया कि हम कितना भी खुद को मना लें लेकिन आने वाला साल अर्थतंत्र के लिए बेहद संघर्षपूर्ण रहने वाला है।
रेवेन्यू को लगा वायरस-
सबसे लंबे लॉकडाउन की घोषणा के बाद पहले ही सरकारी खजाने पर काफी बोझ पड़ चुका है ऐसे में आनें वाले दिनों में इसके और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा लोगों को राहतदेने के लिए पहले ही 1.7 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा की जा चुकी है। Fitch Solutions की मानें तो राहत पैकेज के बाद भारत का FISCAL DEFICIT ( राजकोषीय घाटा) GDP का 6.2 फीसदी तक बढ़ सकता है । भारत सरकार खुद इसके 3.5 फीसदी होने की उम्मीद लगा रही है और बाकी आर्थिक संस्थाएं भी FISCAL DEFECEIT के 4.5 फीसदी होने तक की बात कह रही हैं।
कोरोना अकेले नहीं जिम्मेदार-
अर्थशास्त्रियों की मानें तो सिर्फ कोरोना वायरस इसके ले जिम्मेदारी नहीं है ( कोरोना से पहले भी इस साल हमारी अर्थव्यवस्था महज 5 फीसदी की दर से आगे बढ़ रही थी । ) हां इतना जरूर है कि कोरोना से बचाने के लिए लगाए गए 3 हफ्ते के लॉकडाउन ने इसे बढ़ा जरूर दिया है। दरअसल लॉकडाउन की वजह से सिर्फ आवश्यक आवश्यताओं का उपभोग हो रहा है लोग गैरज़रूरी चीजों पर कतई खर्च नहीं कर रहे हैं।
घट रही है सरकार की आय-
सरकार ने बजट 2020 में कुछ 30 लाख करोड़ के खर्च का अनुमान लगाया था जिसमें से 20 लाख करोड़ टैक्स ( TAX ) , फीस और डिविडेंड के रूप में आने थए जबकि 2.1 लाख करोड़ परसंपत्तियों को बेचकर और 7.8 लाख करोड़ मार्केट से ऋण के रूप में कमाने की योजना थी। लेकिन ताजा सरकारी आंकड़ें बताते हैं कि पिछले 11 महीने में सरकार सिर्फ 74 फीसदी लक्ष्य ही हासिल कर पाई है। जबकि लक्ष्य हासिल करने के लिए सरकार को मार्च के महीने में 3.9 लाख करोड़ मार्केट से हासिल करने होंगे । जो नामुमकिन लगता है । खैर कमोबेश असेट और ऋण के मामले में भी सरकार का कमोबेश यही हाल है।
लेकिन सरकारी अर्थतंत्र में काम करने वाले इसे मानने से इंकार करते हैं। उनका कहना है कि सरकार COVID-19 के खिलाफ लड़ी जा रही जंग में हर तरह से प्रोटेक्शन देने को प्रतिबद्द है फिर चाहें वो मेडिकल सेक्टर में हो या फाइनेंशियली अर्थव्यवस्था को बचाने का ।
एक और राहत पैकेज की ज़रूरत-
सरकार द्वारा दिये गए आर्थिक पैकेज के अलावा RBI द्वारा उठाए गए कदमों से अर्थव्यवस्था में करीब 50 बिलियन डॉलर कैश फ्लो होगा जो अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए अच्छा है। लेकिन अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सरकार को देश की अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए एक और पैकेज लाना ही पड़ेगा उसके लिए हो सकता है सरकार को आरबीआई की मदद भी लेनी पड़े।