ईरान और वेनेजुएला संयुक्ति रूप से भारत में कुल खपत का 17.6 फीसदी कच्चा तेल निर्यात करत हैं। 2 मई को अमरीका द्वारा ईरान पर प्रतिबंध के बाद भारत के तेल आयात का छूट खत्म होगा। वैश्विक स्तर पर तेल की सप्लाई कम होने से मांग बढ़ेगी और कच्चे तेल की कीमतों उछाल देखने को मिलेगा।
नई दिल्ली। गत सोमवार को ब्रेंट क्रुड आॅयल ( brent crude oil ) इंट्रा-डे कारोबार के दौरान 74.31 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया। इसके पहले कारोबारी दिन की तुलना में ब्रेंट क्रुड ऑयल का यह भाव 2.4 फीसदी अधिक रहा। इसी दौरान, डॉलर के मुकाबले रुपया 31 पैसे प्रति डॉलर लुढ़ककर 69.67 के स्तर पर फिसल गया। कच्चे तेल की कीमतों में इजाफे से भारतीय अर्थव्यवस्था को भी झटका लगता है, क्योंकि भारत में आयात किए जाने वाली चीजों में सबसे अधिक कच्चा तेल होता है। यदि कच्चे तेल के भाव में ऐसे ही इजाफा होता रहा तो इससे न केवल रुपए की स्थिरता और शेयर बाजार में ही गिरावट रहेगी, बल्कि इससे मुद्रास्फिति पर भी असर पड़ेगा।
आखिर ब्रेंट क्रुड ऑयल की कीमतों में इतना इजाफा क्यों हो रहा है?
सोमवार को कच्चे तेल की कीमतों में यह उछाल उन रिपोट्र्स के बाद हुआ जिसमें अमरीका द्वारा ईरान से तेल आयात करने वाले देशों पर भी प्रतिबंध लगाने का दावा किया गया है। इन रिपोट्र्स के मुताबिक, अमरीकी सचिव माइक पॉम्प्यो ने कहा है कि इन देशों को ईरान पर प्रतिबंध के बाद कच्चा तेल आयात करने के लिए और रियायत नहीं दी जाएगी। गौरतलब है कि पिछले साल नवंबर माह में अमरीका ने ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाया था, जिसके बाद भी कुछ देशों को ईरान से तेल आयात करने को लेकर छह महीनों के लिए छूट मिली थी। इस छूट की सीमा 2 मई का खत्म हो रही है। खास बात है कि इन देशों की लिस्ट में भारत भी है। भारत के अतिरिक्त इन देशों के लिस्ट में दक्षिण कोरिया, चीन, जापान और तुर्की जैसे देश शामिल हैं। ओपेक देशों द्वारा तेल उत्पादन में कटौती और अमरीका द्वारा वेनेजुएला पर प्रतिबंध लगने के बाद मार्च माह में से ही कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा देखने को मिल रहा है।
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से डॉलर के मुकाबले रुपए पर क्या होगा असर?
विदेशी निवेशकों द्वारा मार्च माह के दौरान भारतीय बाजारों में भारी निवेश के बाद डॉलर के मुकाबले रुपए में अच्छी रिकवरी देखने को मिली थी। हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के साथ ही डॉलर के मुकाबले रुपए में भी तेजी देखने को मिल रही है। ऐसे में यदि ब्रेंट क्रुड की कीमतों में यह तेजी जारी रहती है तो इससे रुपए में उछाल देखने को मिल सकता है। वहीं, दूसरी तरफ वैश्विक आर्थिक मंदी की आशंकाओं के बीच रुपए में तेजी दर्ज की जा रही है। रुपए में इस तेजी का प्रमुख कारण कच्चे तेल की कीमतों में उछाल को ही बताया जा रहा है। पिछले साल अक्टूबर माह में भी डॉलर के मुकाबले रुपया 74.34 के सबसे न्यूनतम स्तर पर फिसला था। इस दौरान में कच्चे तेल की कीमतों में भारी तेजी देखने को मिली थी।
अमरीका द्वारा ईरान पर प्रतिबंध से भारत के तेल आयात पर क्या पड़ेगा प्रभाव ?
अप्रैल 2018 और जनवरी 2019 के बीच 10 महीनों में भारत में करीब 97 अरब डॉलर का कच्चा तेल आयात किया गया। इसमें से करीब 11.2 फीसदी यानी 10.9 अरब डॉलर का कच्चा तेल केवल ईरान से आयात किया गया था। 2 मई 2019 तक भारत द्वारा ईरान से कच्चा तेल आयात करने के लिए अमरीका ने आयात का छूट दिया था। वेनेजुएला पर अमरीका के प्रतिबंध के बााद भारत को वेनेजुएला से भी कच्चा तेल आयात करने की तय सीमा है। इन 10 महीनों में भारत ने वेनेजुएला से अपनी कुल खपत का 6.4 फीसदी कच्चा तेल ही आयात किया है। ऐसे में यदि दोनों देशों से भारत द्वारा कच्चा तेल आयात करने पर प्रतिबंध लगता है तो भारत अपने कुल जरूरत का 17.6 फीसदी कच्चा तेल आयात नहीं कर पाएगा। दुनिया के दूसरे देशों में भी इन दो देशों से सप्लाई बंद कर दी जाती है तो इससे वैश्विक स्तर पर भी तेल सप्लाई में कमी आएगी, जिसके बाद मांग बढऩे की वजह से एक कच्चे तेल के आयात की कीमतों में उछाल देखने को मिलेगा।
भारत के लिए तेल आयात करने के लिए दूसरे विकल्प क्या हैं ?
इराक भारत का दूसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल निर्यातक है, जबकि सउदी अरब दूसरे नंबर पर है। यूएई और नाइजीरिया भी संयुक्त रूप से भारत की कुल खपत का 16.7 फीसदी कच्चा तेल निर्यात करते हैं। हालांकि, अमरीका भारत के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है। वित्त वर्ष 2017-18 में भारत को तेल निर्यात करने वाले शीर्ष 10 देशों में अमरीका का नाम नहीं था। जबिक वित्त वर्ष 19 में अमरीका 9वें स्थान पर है, जो कि 3 फीसदी तेल ही भारत में निर्यात करता है।
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