मैसूर विश्वविद्यालय ने विदेशी छात्रों को आकर्षित करने के लिए मौजूदा शैक्षणिक वर्ष से दाखिले के लिए जरूरी प्रवेश परीक्षा की बाध्यता को खत्म करने का निर्णय लिया है।
कर्नाटक में मैसूर विश्वविद्यालय ने विदेशी छात्रों को आकर्षित करने के लिए मौजूदा शैक्षणिक वर्ष से दाखिले के लिए जरूरी प्रवेश परीक्षा की बाध्यता को खत्म करने का निर्णय लिया है। विश्वविद्यालय में पिछले कुछ समय से दाखिला लेने वाले विदेशी छात्रों की संख्या लगातार घट रही थी, इसलिए उन्हें लुभाने के मकसद से यह कदम उठाया गया है।
विश्वविद्यालय की ओर से जारी विज्ञप्ति के मुताबिक साल 2008 में विभिन्न देशों से आए छात्रों की संख्या 1400 थी, वहीं साल 2017-18 के दौरान यहां पढ़ाई करने वाले विदेशी छात्रों की संख्या केवल 765 रह गयी। विश्वविद्यालय संघ को उम्मीद है कि प्रवेश परीक्षा की बाध्यता खत्म करने से विदेशी छात्रों की संख्या में इजाफा होगा।
विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर कोर्सेस में प्रवेश लेने के लिए विदेशी विद्यार्थियों को प्रवेश परीक्षा देनी होती थी। परीक्षा इस साल जून में होनी है और विदेशी विद्यार्थियों के लिए इसमें बैठ पाना मुश्किल होगा क्योंकि उन्हें समय पर वीजा नहीं मिल पाएगा। प्रवेश परीक्षा देने के बाद जुलाई के आखिर में या अगस्त में स्टडी सर्टिफिकेट मिलता है, लेकिन तब तक कक्षाएं प्रारंभ हो जाती हैं जिससे विदेशी छात्र-छात्राओं की उपस्थिति पर असर पड़ता है।
पुणे यूनिवर्सिटी के बाद मैसूर यूनिवर्सिटी का नंबर दूसरा है जिसमें सबसे ज्यादा विदेश छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं। मैसूर यूनिवर्सिटी में सबसे ज्यादा विद्यार्थी अफगानिस्तान औ अफ्रीकी मूल के हैं। अधिकतर विदेशी छात्र-छात्राएं गुणवत्ता शिक्षा, उचित लागत, जीवन की प्रबंधीय लागत और अनुकूल अकादमिक वातावरण के कारण भारत में पढऩा पसंद करते हैं।
इंटरनेशनल सेंटर के निदेशक जी आर जनार्धन ने बताया कि हम चाहते हैं कि यूनिवर्सिटी में ज्यादा से ज्यादा विदेशी बच्चे पढ़ें, इसलिए हमने उनके लिए प्रवेश परीक्षा की बाध्यता को ही खत्म करने का फैसला कि या है। हम कैंपस के अंदर और बाहर विदेशी छात्र-छात्राओं के व्यवहार पर भी नजर रखते हैं। उनकी सुरक्षा ही नहीं, लोगों के साथ किस तरह का व्यवहार करते हैं, इस बात पर भी हम गंभीरता से नजर रखते हैं।