शिक्षा

देश के 1 लाख स्कूलों में सिर्फ एक टीचर, नीति आयोग की रिपोर्ट ने खोली शिक्षा व्यवस्था की पोल

NITI Aayog Report 2026: नीति आयोग की नई रिपोर्ट में भारतीय स्कूली शिक्षा व्यवस्था की खामियां उजागर हुई हैं। देश के 1 लाख स्कूलों में सिर्फ एक टीचर ही मौजूद है और 10वीं के बाद ड्रॉपआउट रेट में भी भारी इजाफा हुआ है। सरकारी ही नहीं, देश के प्राइवेट स्कूलों की स्थिति भी बदहाल है। जानिए क्या कहती है नीति आयोग की यह नई रिपोर्ट।
3 min read
May 09, 2026
Indian School System
NITI Aayog Report 2026 (image- ChatGPT)

NITI Aayog Report: भारत में प्राइमरी स्तर पर भले ही ज्यादातर बच्चों का स्कूलों में दाखिला हो गया हो लेकिन, देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था आज भी कई गंभीर बुनियादी समस्याओं से जूझ रही है। एक लाख से ज्यादा स्कूलों में सिर्फ एक टीचर का होना, शिक्षकों की भारी कमी, 10th के बाद बच्चों का पढ़ाई छोड़ना और प्राइवेट स्कूलों में भी पढ़ाई का खराब स्तर इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। हाल ही नीति आयोग की नई रिपोर्ट में भारतीय शिक्षा व्यवस्था की यह कड़वी सच्चाई सामने आई है।

1st से 12th तक सिर्फ 5 परसेंट स्कूल

नीति आयोग की इस रिपोर्ट के मुताबिक, देश में फिलहाल 14.71 लाख स्कूल हैं जिनमें करीब 24.69 करोड़ बच्चे पढ़ रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ी परेशानी स्कूलों का अधूरा ढांचा है। देश में 7.3 लाख प्राइमरी स्कूल हैं लेकिन, 9वीं और 10वीं के लिए सिर्फ 1.42 लाख स्कूल ही बचे हैं। पूरे भारत में सिर्फ 5 परसेंट स्कूल ही ऐसे हैं जहां, पहली क्लास से लेकर 12वीं तक की पढ़ाई एक ही जगह होती है। इस वजह से बच्चों को बार बार स्कूल बदलना पड़ता है और कई बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। इसके अलावा 35 प्रतिशत स्कूलों में 50 से भी कम बच्चे हैं जिसकी वजह से वहां रिसोर्सेज और सुविधाएं प्रोवाइड कराना मुश्किल हो रहा है।

पढ़ाई छोड़ रहे लाखों बच्चे

रिपोर्ट बताती है कि, प्राइमरी लेवल पर ड्रॉपआउट रेट केवल 0.3 प्रतिशत है लेकिन 10वीं क्लास तक आते आते यह आंकड़ा बढ़कर 11.5 प्रतिशत हो जाता है। 11वीं और 12वीं कक्षा में दाखिले का राष्ट्रीय औसत भी महज 58.4 परसेंट है। बिहार, मेघालय, नागालैंड और असम जैसे राज्यों की हालत इस मामले में सबसे ज्यादा खराब है। पैसों की कमी, जल्दी काम पर लगने का दबाव और सामाजिक कारणों से बड़ी तादाद में बच्चे 10वीं के बाद पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हैं।

टीचर्स की भारी कमी और योग्यता पर सवाल

नीति आयोग ने शिक्षकों की कमी को एक बहुत बड़ा मुद्दा बताया है। अकेले बिहार के प्राइमरी स्कूलों में 2 लाखसे ज्यादा पद खाली हैं। वहीं पूरे देश में लगभग 1.04 लाख स्कूल ऐसे हैं जो सिर्फ, एक टीचर के भरोसे चल रहे हैं। ये अकेले टीचर बच्चों को पढ़ाने के साथ साथ मिड डे मील और बाकी प्रशासनिक काम भी देखते हैं। इसके अलावा टीचर्स की योग्यता पर भी रिपोर्ट में सवाल उठाए गए हैं। टीईटी या सीटीईटी जैसी शिक्षक पात्रता परीक्षा में सिर्फ 10 से 15 परसेंट उम्मीदवार ही 60 प्रतिशत से ज्यादा अंक ला पाते हैं। कई शिक्षकों को तो अपने ही सब्जेक्ट का सही नॉलेज नहीं है। साथ ही शिक्षकों का 14 परसेंट समय चुनाव और सर्वे जैसे नॉन एकेडमिक एक्टिविटीज में ही बर्बाद हो जाता है।

प्राइवेट स्कूलों के दावे भी निकले खोखले

लोग अच्छी पढ़ाई और इंग्लिश मीडियम के लालच में बच्चों को सरकारी स्कूलों से निकालकर प्राइवेट स्कूलों में भेज रहे हैं। सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या 2005 में 71 परसेंट थी जो अबघटकर 49.24 परसेंट रह गई है। लेकिन रिपोर्ट यह भी बताती है कि, कम फीस वाले प्राइवेट स्कूलों का हाल भी काफी बुरा है। वहां 5वीं क्लास के 35 परसेंटबच्चे दूसरी क्लास की किताब तक नहीं पढ़ पा रहे हैं और 60 परसेंट बच्चे गणित का सामान्य भाग यानी डिवाइड भी नहीं कर पाते हैं।

नीति आयोग ने दिए ये बड़े सुझाव

इन सभी समस्याओं को दूर करने के लिए नीति आयोग ने कई अहम सुझाव दिए हैं। आयोग का कहना है कि, पहली से 12वीं क्लास तक के स्कूल एक ही जगह होने चाहिए ताकि, बच्चों को बार-बार स्कूल न बदलना पड़े। किताबी ज्ञान रटाने की जगह बच्चों को चीजें गहराई से सिखाने पर जोर दिया जाए। कक्षाओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का इस्तेमाल हो लेकिन, एक लिमिट में ताकि बच्चों की खुद की सोचने-समझने की क्षमता खत्म न हो। इसके अलावा शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कामों से पूरी तरह आज़ाद किया जाए। आयोग ने इन सभी सुधारों को सुशिक्षित भारत अभियान का नाम दिया है।

Updated on:
09 May 2026 01:33 pm
Published on:
09 May 2026 01:24 pm