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दोरोदा स्कूल की शिफ्टिंग पर सवाल, किसानों ने कमरों में भरा अनाज, बच्चे खुले में पढ़ने को मजबूर

कठूमर क्षेत्र के दारोदा स्कूल की शिफ्टिंग को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। भवन मालिक ने कमरों में अनाज भर दिया है और शौचालय भी बंद कर दिए हैं। ऐसे में बच्चे खुले में पढ़ने को मजबूर हैं।

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representative picture (AI)

कठूमर क्षेत्र के दारोदा स्थित राजकीय सीनियर सेकेंडरी स्कूल की शिफ्टिंग को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। इस स्कूल को जिस निजी भवन में शिफ्ट किया गया था, वहां कमरों में अनाज भर दिया गया है। ऐसे में बच्चे खुले में पढ़ने को मजबूर हैं।

स्कूल प्रिंसिपल ने करीब एक माह पहले ही विभाग को रिपोर्ट भेजकर बताया था कि भवन मालिक ने कमरों में अनाज भर दिया है और शौचालय भी बंद कर दिए हैं। इसके बाद भवन मालिक ने भी दस दिन पहले जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय को पत्र भेजकर पूरे भवन को खाली कराने में असमर्थतता जता दी, लेकिन आरोप है कि इस पत्र को दबाने का प्रयास किया जा रहा है।

इधर, अव्यवस्थित पढ़ाई से परेशान कई अभिभावकों ने अपने बच्चों के टीसी कटवाकर निजी स्कूलों में दाखिला करा दिया है। ग्रामीणों और एसएमडी सदस्यों का कहना है कि विभाग समय रहते निर्णय नहीं ले रहा, जबकि बच्चों की पढ़ाई लगातार प्रभावित हो रही है।

शपथ पत्र में 10 कमरे, मौके पर केवल 8

मामले में सबसे बड़ा सवाल निजी भवन के संबंध में दिए गए शपथ पत्र को लेकर उठ रहा है। विभाग को 10 कमरों का शपथ पत्र दिया गया, जबकि मौके पर भू तल पर केवल 6 और पहली मंजिल पर 2 कमरे ही उपलब्ध हैं। पहली मंजिल के दोनों कमरों में भवन मालिक का परिवार रह रहा है। वहीं, नीचे के कई कमरों में अनाज भर दिया गया है। आरटीआइ से सामने आया कि स्कूल को गारू से दारोदा शिफ्ट करने की प्रक्रिया भी जल्दबाजी में की गई।

कलेक्टर के आदेश के बाद हटी हाईटेंशन लाइन

एसएमडी सदस्य प्रीतम सिंह, हरिराम सैनी और आसुद्दीन ने जिला कलेक्टर डॉ. आर्तिका शुक्ला से स्कूल को खेल मैदान में बने नए कमरों और अटल सेवा केंद्र में शिफ्ट करने की मांग की थी। शुरुआत में अधिकारियों ने खेल मैदान के ऊपर से गुजर रही हाईटेंशन लाइन को बाधा बताया था। इस पर कलेक्टर ने जयपुर डिस्कॉम को लाइन शिफ्ट करने के निर्देश दिए। डिस्कॉम ने करीब 10 दिन पहले लाइन हटाने का काम भी पूरा कर दिया, लेकिन इसके बावजूद स्कूल शिफ्टिंग पर अंतिम निर्णय नहीं हो सका है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई की गति धीमी रहने से बच्चों का भविष्य दांव पर लगा हुआ है।