नागौर. राजस्थान विधानसभा के 16वें कार्यकाल के चतुर्थ सत्र में शिक्षा विभाग से जुड़े जर्जर विद्यालय भवनों का मुद्दा सबसे ज्यादा चर्चा में रहा, लेकिन यही सवाल सरकार के लिए सबसे असहज भी साबित हुए। चतुर्थ सत्र के दौरान विधायकों की ओर से शिक्षा विभाग से जुड़े कुल 126 प्रश्न पूछे गए, जिनमें से 40 […]
नागौर. राजस्थान विधानसभा के 16वें कार्यकाल के चतुर्थ सत्र में शिक्षा विभाग से जुड़े जर्जर विद्यालय भवनों का मुद्दा सबसे ज्यादा चर्चा में रहा, लेकिन यही सवाल सरकार के लिए सबसे असहज भी साबित हुए। चतुर्थ सत्र के दौरान विधायकों की ओर से शिक्षा विभाग से जुड़े कुल 126 प्रश्न पूछे गए, जिनमें से 40 प्रश्न केवल जर्जर विद्यालय भवनों की स्थिति, सुरक्षा और पुनर्निर्माण से संबंधित थे। हैरानी की बात यह है कि इन 40 में से केवल 8 प्रश्नों के ही जवाब सरकार की ओर से दिए गए, जबकि 32 प्रश्न आज भी अनुत्तरित हैं।जिन सवालों के जवाब दिए गए हैं, वे भी अधिकतर उन्हीं विधानसभा क्षेत्रों तक सीमित रहे, जहां के विधायकों की ओर से प्रश्न पूछे गए थे। पूरे प्रदेश से जुड़े जर्जर विद्यालय भवनों की स्थिति पर केवल एक ही प्रश्न का आंशिक जवाब सदन में रखा गया। अब जबकि विधानसभा का पांचवां सत्र शुरू होने वाला है और सरकार ने विधायकों पर अपने विधानसभा क्षेत्र से बाहर के सवाल पूछने पर रोक लगा दी है, तो यह आशंका गहराने लगी है कि क्या पिछले सत्रों में पूछे गए प्रश्नों के जवाब अब कभी मिल भी पाएंगे या नहीं।
पिपलोदी हादसे ने खड़े किए थे सवाल
यह मुद्दा इसलिए भी गंभीर है क्योंकि प्रदेश में जर्जर सरकारी स्कूल भवनों से जुड़े हादसे लगातार सामने आ चुके हैं। बीकानेर जिले के केड़ली गांव में वर्ष 2024 में टांके की पट्टियां टूटने से तीन बालिकाओं की दर्दनाक मौत हो गई थी। बाड़मेर के बांकाणा कुआं स्थित विद्यालय का मुख्य द्वार गिरने से वर्ष 2025 में एक बालक की मौत हुई और एक गंभीर रूप से घायल हुआ। कोटा के दरबीजी सुल्तानपुर विद्यालय में जर्जर भवन गिरने से एक बच्चे की जान चली गई, जबकि झालावाड़ के पिपलोदी विद्यालय में वर्ष 2025 में भवन ढहने से सात बच्चों की मौत और 21 बच्चे घायल हुए। इन घटनाओं ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया, लेकिन इसके बावजूद विधानसभा में पूछे गए सवालों पर सरकार की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है।
लीपापोती से ज्यादा कुछ नहीं हुआ
मकराना विधायक जाकिर हुसैन गैसावत के सवाल का जवाब देते हुए राज्य सरकार के शिक्षा विभाग ने बताया कि जिला कलक्टरों की ओर से गठित तकनीकी दलों के निरीक्षण में प्रदेशभर में 3,768 विद्यालय भवन जर्जर पाए गए हैं। राज्य सरकार की ओर से जर्जर/क्षतिग्रस्त भवनों के स्थान पर नवीन भवन निर्माण एवं मरम्मत योग्य विद्यालय भवनों की दुरुस्त मरम्मत कार्य को प्राथमिकता से लिया जा रहा है। इसके तहत वित्तीय वर्ष 2024-25 में 750 विद्यालयों में राशि 82.72 करोड़ रुपए एवं वर्ष 2025-26 में 1936 राजकीय विद्यालयों में राशि 169.52 करोड़ रुपए के मरम्मत/वृहद मरम्मत के कार्य स्वीकृत किए गए। ज्यादातर स्कूलों में जारी राशि से छत पर केमिकल की लेयर बिछाने के अलावा कुछ नहीं हुआ। केवल कुछ जर्जर भवनों को गिराने का निर्णय लिया गया।
इन प्रश्नों के जवाब नहीं मिले
विधायकों ने विधानसभा में सरकार से सवाल करते हुए पूछा कि जर्जर विद्यालय भवनों का सर्वे कब कराया गया, कितने भवन पुनर्निर्माण योग्य हैं, कितनों की मरम्मत की जरूरत है। इसके साथ ही विद्यार्थियों की सुरक्षा को लेकर बीमा व्यवस्था, दुर्घटनाओं की संख्या और उनमें हुई जनहानि जैसे अहम सवाल भी सदन में उठाए गए, लेकिन इन पर सरकार की ओर से कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया। इसके अलावा गत वर्ष सर्वे में हजारों स्कूल भवनों और कक्षाओं के गिरने की कगार पर होने की बात भी सामने आई, लेकिन कार्य योजना और समय सीमा को लेकर सरकार की ओर से स्थिति स्पष्ट नहीं की गई।
बड़ा सवाल
अब बड़ा सवाल यही है कि जब विधानसभा के भीतर इतने गंभीर मुद्दों पर जवाब नहीं मिल पा रहे हैं, तो प्रदेश के हजारों बच्चों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी। पांचवें सत्र से पहले अनुत्तरित प्रश्न सरकार के लिए न केवल प्रशासनिक चुनौती हैं, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था और बच्चों की जान से जुड़ा एक बड़ा सवाल भी बन चुके हैं।