Eid 2023: Why do celebrates Eid, History and Significance: जिस दिन चांद दिखता है, उस दिन चांद देखने के बाद मुस्लिम धर्मावलंबी घर के बड़ों को विश करते हैं यानी सलाम करते हैं और चांद मुबारक कहते हैं। सऊदी अरब में सबसे पहले ईद की तारीख का ऐलान किया जाता है। इस लेख में आप जान पाएंगे कि ईद क्यों मनाई जाती है, इस परम्परा की शुरुआत कैसे हुई? वहीं यह भी कि भारत में ईद कब मनाई जाएगी... ?
Eid 2023: Why do celebrates Eid, History and Significance : रमजान का माह-ए-मुबारक जारी है। आज 16 रोजे हो चुके हैं। आपको बता दें कि भारत में 23 मार्च को चांद के दीदार के साथ ही 24 मार्च से रमजान का माह-ए-मुबारक शुरू हो गया था। अब जल्द ही ईद का त्योहार मनाया जाएगा। ईद यानी ईद-उल-फितर, मीठी ईद या कहें सैवइयां वाली ईद, मुस्लिम समुदाय का प्रमुख पर्व है। एक महीने तक रोजा रखने के बाद ईद के इंतजार की खुशी अलग ही होती है। इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक साल के नवें महीने में रोजा रखा जाता है और 10वें शव्वाल की पहली तारीख को ईद मनाई जाती है। इस दिन सभी रोजेदारों के रोजे पूरे हो जाते हैं। हालांकि ईद मनाने की तारीख चांद दिखने के बाद ही मानी जाती है। जिस दिन चांद दिखता है, उस दिन चांद देखने के बाद मुस्लिम धर्मावलंबी घर के बड़ों को विश करते हैं यानी सलाम करते हैं और चांद मुबारक कहते हैं। सऊदी अरब में सबसे पहले ईद की तारीख का ऐलान किया जाता है। इस लेख में आप जान पाएंगे कि ईद क्यों मनाई जाती है, इस परम्परा की शुरुआत कैसे हुई? वहीं यह भी कि भारत में ईद कब मनाई जाएगी... ?
भारत में कब मनाई जाएगी ईद
रिपोर्ट की मानें तो, पाकिस्तान में ईद की तारीख का ऐलान कर दिया गया है। पाकिस्तान में ईद की तारीख 22 अप्रैल 2023 रहेगी। भारत में भी 22 अप्रैल को ही ईद मनाए जाने की उम्मीद है। दरअसल, पाकिस्तान में इस साल रमजान का माह-ए-मुबारक अरब देशों के साथ शुरू हो गया था। यानी अरब देशों में पहला रोजा 23 मार्च 2023 को रखा गया था। लेकिन भारत में 24 अप्रैल को पहला रोजा रखा गया था। यदि भारत में 21 अप्रैल को चांद दिखता है तो फिर 22 अप्रैल को ईद मनाई जाएगी। ऐसे में भारत में 29 रोजे ही होंगे। जबकि पाकिस्तान और अरब देशों में पूरे 30 रोजे रखे जाने की खुशी मनाई जाएगी।
ईद-उल-फितर का महत्व
मुस्लिम समुदाय के लिए ईद का पर्व बेहद खास माना जाता है। ये अल्लाह का शुक्रिया अदा करने का दिन होता है। इस्लामिक कैलेंडर में नवां महीना रमजान का है। वहीं दसवां महीना शव्वाल है। शव्वाल का पहला दिन दुनिया भर में ईद-उल-फितर के रूप में मनाया जाता है। शव्वाल का अर्थ है, 'उपवास तोडऩे का त्योहार।'
ऐसे मनाई जाती है ईद
ईद के दिन सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर नए कपड़े पहने जाते हैं। फिर ईद की नमाज अदा की जाती है। ज्यादातर लोग कोशिश करते हैं कि नमाज ईदगाह जाकर पढ़ी जाए। नमाज के बाद सभी एक-दूसरे से सलाम करते हुए, गले मिलते हुए ईद की मुबारक बाद देते हैं। घर लौटकर सभी सैवइयों वाली खीर का सेवन करते हैं और तरह-तरह के पकवान का मजा लेते हैं। परिवार के बड़े लोग ईद पर सलाम करने आने वाले अपने से छोटे लोगों को अपनी इच्छानुसार ईदी यानी कुछ राशि या तोहफा देते हैं।
जानें क्यों मनाई जाती है ईद
मक्का से अल्लाह के पैगंबर हजरत मुहम्मद सलल्लाहु अलैही वसल्लम के प्रवास के बाद पवित्र शहर मदीना में ईद-उल-फितर का उत्सव शुरू हुआ। माना जाता है कि पैगम्बर हजरत मुहम्मद सलल्लाहु अलैही वसल्लम ने बद्र की लड़ाई में जीत हासिल की थी। इस जीत की खुशी में सबका मुंह मीठा करवाया गया था। इसी दिन को मीठी ईद या ईद-उल-फितर के रूप में मनाया जाता है। इस्लाम के जानकार बताते हैं कि इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार हिजरी संवत 2 यानी 624 ईस्वी में पहली बार (करीब 1400 साल पहले) ईद-उल-फितर मनाया गया था। पैगम्बर हजरत मुहम्मद सलल्लाहु अलैही वसल्लम ने फरमाया है कि उत्सव या त्योहार मनाने के लिए अल्लाह ने कुरान में पहले से ही 2 सबसे पवित्र दिन बताए हैं। इन्हें ईद-उल-फितर और ईद-उल-जुहा कहा गया है। इस प्रकार ईद मनाने की परम्परा अस्तित्व में आई।
ईद का त्योहार देता है सद्भावना का पैगाम
ईद का त्योहार सबको साथ लेकर चलने का पैगाम देता है। ईद पर हर मुसलमान चाहे वो आर्थिक रूप से संपन्न हो या न हो, सभी एक साथ नमाज पढ़ते हैं और एक दूसरे को गले लगाते हैं। इस्लाम में ईद का एक महत्वपूर्ण पहलू है जकात यानी दान। हर मुसलमान को धन, भोजन और कपड़े के रूप में कुछ न कुछ दान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। कुरान में जकात-अल-फित्र को अनिवार्य बताया गया है। इसे हर मुसलमान का फर्ज कहा गया है। ये गरीबों को दिए जाने वाला दान है। परंपरागत रूप से इसे रमजान के अंत में और लोगों को ईद की नमाज पर जाने से पहले दिया जाता है। मुस्लिम अपनी संपत्ति को हमेशा पाक करने के रूप में अपनी सालाना बचत का एक हिस्सा गरीब या जरूरतमंदों को कर के रूप में देते हैं। विश्व के कुछ मुस्लिम देशों में जकात स्वैच्छिक है, वहीं अन्य देशों में इसे अनिवार्य माना गया है।