आरबीआर्इ के गवर्नर आैर पीएम एवं वित्त मंत्री के साथ अच्छे संबंध नहीं चल रहे हैं। विवाद इतना बढ़ गया है कि दोनों पक्ष खुलकर सामने आ गए हैं।
नर्इ दिल्ली। हेडलाइन पढ़कर आप शाॅक्ड तो जरूर हुए हाेंगे। लेकिन यह बात उन दिनों की नहीं है कि जब मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री थे। यह बात उन दिनों की है जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री आैर प्रणब मुखर्जी वित्त मंत्री थे। उस समय दोनों के बीच इतनी खटास आ गर्इ थी कि कि मनमोहन अपने पद से इस्तीफा देना चाहते थे। आज हम ये बात किस्सा इसलिए लेकर अाए हैं कि क्योंकि मौजूदा समय में आरबीआर्इ के गवर्नर आैर पीएम एवं वित्त मंत्री के साथ अच्छे संबंध नहीं चल रहे हैं। विवाद इतना बढ़ गया है कि दोनों पक्ष खुलकर सामने आ गए हैं। आइए आपको भी बताते हैं कि इससे पहले आखिर किन आरबीआर्इ गवर्नर को किस सरकार में अपने पद से या तो इस्तीफा देना पड़ा या फिर पद से हाथ धोना पड़ा। शुरूआत करेंगे देश की आजादी से पहले देश के पहले आरबीआर्इ गवर्नर से…
जब आजादी से पहले हुआ था यह विवाद
रिजर्व बैंक के पहले गवर्नर सर ओसबोर्न स्मिथ ने विनिमय दर को लेकर सरकार से विवाद के बाद इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने किसी बैंक नोट पर साइन भी नहीं किया। यह किस्सा आज भी काफी याद किया जाता है। वैसे उस दौर के लोग मौजूइदा समय में ना के बराबर हैं। फिर भी किताबों आैर इतिहासकारों को यह किस्सा अभी तक याद है।
आजाद देश में आरबीआर्इ के गवर्नर के साथ हुआ यह विवाद
आजाद देश में किसी वित्त मंत्री आैर आरबीआर्इ गवर्नर के बीच पहला विवाद वित्त मंत्री टीटी कृष्णामचारी आैर आरबीआई गवर्नर सर बेनेगल रामा राव के बीच हुआ। दोनों के बीच विवाद वित्त के आरबीआर्इ के कामकाज में दखल देने को लेकर था। 7 साल तक आरबीआई के गवर्नर रहे सर बेनेगल रामा राव ने पीएम जवाहर लाल नेहरू को लेटर लिखकर इस बात की शिकायत भी की। नेहरू के कहने पर वह पद पर बने रहने के बाद भी उनके संबंधों में कोर्इ खास बदलाव नहीं हुआ आैर 7 जनवरी 1957 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
इंदिरा से टकरा गए थे यह आरबीआर्इ गवर्नर
यह बात उन दिनों की है जब देश में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थी आैर वित्त मंत्रालय भी उनके ही पास था। इंदिरा आैर आरबीआर्इ गवर्नर के बीच का विवाद क्रेडिट लिमिट बढ़ाने को लेकर शुरू हुआ। केंद्रीय बैंक ने इसे बढ़ाने से इनकार कर दिया और गवर्नर एस जगन्नाथन ने 19 मई 1975 को इस्तीफा दे दिया।
मोरारजी सरकार में गर्वनर ने दिया इस्तीफा
मोरारजी देसार्इ की अल्प समय की सरकार में भी आरबीआर्इ आैर वित्त मंत्री के बीच का विवाद काफी मशहूर रहा था। उस समय के वित्त मंत्री हीरूभाई पटेल आरबीआई गवर्नर केआर पुरी को हटाने चाहते थे। जिसके बाद पुरी ने 2 मई 1977 को खुद ही इस्तीफा दे दिया।
जब मनमोहन सिंह देना चाहते थे इस्तीफा
अब आत है उस किस्से पर जिक्र हम करते करते अधूरा छोड़ आए थे। बात उस समय की है जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थी आैर प्रणब मुखर्जी के वित्त मंत्री थे। उस समय देश के आरबीआर्इ गवर्नर मनमोहन सिंह थे। प्रणब आैर मनमोहन सिंह के बीच उस समय कुछ ठीक नहीं चल रहा था। एेसे में मनमोहन सिंह आरबीआई गवर्नर के पद से इस्तीफा देना चाहते थे। लेकिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर वो अपने पद पर बने रहे। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी बने आैर मनमोहन सिंह को उन्होंने प्लानिंग कमीशन में भेज दिया।
यशवंत से हुआ विवाद
मनमोहन सिंह के बाद पूर्व वित्त सचिव आरएन मल्होत्रा को केंद्रीय बैंक का मुखिया बनाया गया। अधिक लाभांश बांटने को लेकर उनका सरकार के साथ तनाव हुआ। 1990 में वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा से विवाद के बाद उनको इस्तीफा देना पड़ा।
वाईवी रेड्डी आैर सुब्बाराव का चिदंबरम के साथ विवाद
आरबीआई के पूर्व गवर्नर वाईवी रेड्डी का कार्यकाल काफी हंगामेदार रहा। उन्होंने सबसे पहले सरकार द्वारा प्राइवेट बैंकों के लिए एफडीआई सीमा बढ़ाने का विरोध किया। विदेशी संस्थागत निवेश को लेकर उनका तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम के साथ विवाद हुआ। ब्याज दरों को लेकर भी तनाव हुआ। उसके बाद फाइनेंशियल स्टैबिलिटी एंड डिवेलपमेंट काउंसिल के गठन को लेकर सरकार के साथ डी सुब्बाराव की पहली जंग हुई। इसके बाद ब्याज दरों सहित कई मुद्दों को लेकर उनका तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम के साथ मतभेद हुआ।
मोदी सरकार आैर रघुराम के बीच की रार
रघुराम राजन ने स्वतंत्र पब्लिक डेब्ट ऑफिस का विरोध किया और ब्याज दरों में कटौती के दबाव का विरोध किया। असहिष्णुता और मेक इन इंडिया जैसे मुद्दे पर उन्होंने अपने भाषण से सरकार को असहज किया।