गोरखपुर

जर्सी गाय का दूध उत्तेजना पैदा करता, बीपी बढ़ाता, मानसिक विकार होता

जर्सी गाय व देसी गाय में तुलना

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गोरखनाथ मंदिर में ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ व ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि समारोह के दौरान आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल आचार्य देवब्रत ने कहा कि भारत में नई कृषि क्रान्ति का युग दस्तक दे रहा है। खेती में सुधार या जीरो बजट कृषि को गो वंश के संरक्षण संर्वधन से ही पूर्ण किया जा सकता। भारतीय नस्ल की गायों पर हुए शोधों ने यह सिद्ध कर दिया है कि कृषि रासायनिक खादो और जैविक खादों की अपेक्षा गो वंश के गोबर और गो मूत्र पर आधारित खेती न केवल हमारी लागत शून्य करेगी अपितू स्वास्थ्यवर्धक अन्न का उत्पादन करेगी और किसानो की आय मे अकल्पनीय वृद्धि होगी। न्यूजीलैंड एवं आस्ट्रेलिया में पशु वैज्ञानिकों ने भारतीय नस्ल की गायों और जर्सी गायों के दूध पर जो शोध निष्कर्ष दिये है वह हमारी आंख खोलने वाला है। जर्सी गायों का दूध उतेजना पैदा करता है। विषाद पैदा करता है। रक्तचाप बढ़ाता है। जबकि भारतीय नस्ल की सभी गायों का दूध मानव स्वास्थ्य के लिए अमृत है। भारतीयों ऋषियों ने यह शोध आज से हजारों वर्ष पहले कर लिया था। वेद के रचयिताओं ने लिखा है कि गाय विश्व की माता है। गाय की महत्व को इस बात से भी समझा जा सकता है कि माॅ की ही तरह नौ माह दस दिनों में गाय भी बच्चा देती है। माॅ के दूध के बाद एक मात्र गाय का दूध माॅ के दूध जैसा अमृत है। गुजरात प्रान्त के पशु चिकित्सको की एक टीम नें गिरि नस्ल की गाय पर शोध किया है। और उन्होनें यह प्रमाणित किया है कि गो मूत्र में स्वर्ण होता है। एक गाय के गो मूत्र से एक वर्ष में लगभग 55000 हजार रूपये का स्वर्ण प्राप्त किया जा सकता है। हमारे शास्त्र पहले से कहते है कि गाय के पेट में सवा मन सोना होता है।
उन्होनें गो वंश पर आधारित कृषि और कृषि उत्पादों पर नये शोध एंव उनके स्वयं के द्वारा किये जा रहें प्रयोंगो को विस्तार से रखा। उन्होनें कहा कि इधर के 30-40 वर्षो में हमने रासायनिक खादों के माध्यम से खाद्यानों में जहर घोला है। जिसके कारण चिकित्सालय भरे पड़े है। इधर जैविक खेती का प्रचार-प्रसार शुरू हुआ है जो अव्यवहारिक है जो मैं स्वयं अपने खेतों में इसकी स्थलता प्रमाणित कि है। जैविक खेती के लिए एक एकड़ खेत में तीन सौ कुण्टल खाद चाहिए और इसके लिए 18-20 गो वंश चाहिए। जबकि पद्मश्री सुभाष कालेकर द्वारा जीरो बजट आधारित प्रकृतिक खेती का जो तरीका खोजा गया है, वह भारत के ख्ेातो और किसानों की काया पलट देगी। मैं अपने दो सौ एकड़ खेतो में इस प्रयोग को आजमा रहा हूं। एक गाय से तीस एकड़ खेती की जा सकती है। यह प्रमाणित हो चुका है कि जर्सी गाय के एक ग्राम गोबर में 77-78 लाख जीवाणु होतें हैं जबकि भारतीय नस्ल की गायों के एक ग्राम गोबर में 300-500 तक के जीवाणु पायें गयें हैं। एक गाय के 24 घण्टे के गोबर और गो मूत्र से बनाई गयी खाद से एक एकड़ खेती कराई जा सकती है। उन्होनें खाद बनाने की विधि का विस्तार से वर्णन किया है। उन्होनें कहा कि भारतीय नस्ल के गायों के गोबर और गो मूत्र में ही वह ताकत है कि उसर भूमि को एक वर्ष में उपजाउ बना देगीें। उन्होनें कहा कि अब समय आ गया है कि भारत में भारतीय गो वंश पर आधारित वैज्ञानिक कृषि प्रारम्भ की जाय। भारत दुनिया भर को खाद्यान उपलब्ध कराने में समर्थ होगा। गांव का पैस गांव में और शहर का पैसा भी गांव में जायेगा। उन्होंने कहा कि गाय पशु नही अपितु हिन्दुत्व की आत्मा है। गो-सेवा विषय नही हमारा अस्तित्व है। पंचगव्य के बिना मानव द्विज नही हो सकता। भगवान का धरती पर अवतरण गौ माता की रक्षा के लिए होता रहा है। गौ माता और धरती माता अभिन्न है। गौ माता को स्थिर रूप में देखना हो तो धरती माॅ को देखों और धरती माॅ को चलते फिरते देखना हो तो गौ माता को देखो।

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Published on:
27 Sept 2018 10:07 am
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