लोकसभा चुनाव में खेल बिगड़ने की आशंका की परिणीति तो नहीं है सुनील सिंह पर कार्रवाई
यूपी विधानसभा चुनाव के पहले की बात है, हिंदू युवा वाहिनी और योगी आदित्यनाथ के लिए एक सबसे भरोसेमंद चेहरा हुआ करता था। एक दशक से अधिक समय से वह पूर्वांचल के फायरब्रांड नेता योगी आदित्यनाथ के साथ साए की तरह रहा करता था लेकिन बीजेपी की सरकार बनते ही सबकुछ बदल चुका है। कभी योगी आदित्यनाथ के लिए जीने मरने की हुंकार भरने वाले हियुवा के निष्कासित प्रदेश अध्यक्ष सुनील सिंह सलाखों के पीछे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पुलिस की नजरों में सुनील सुरक्षा के लिए खतरा हैं और उन पर रासुका का तामीला कराया जा चुका है। मौजूं सवाल यह कि ऐसी कौन सी परिस्थिति उत्पन्न हो गई कि मंदिर का यह करीबी अचानक से वहां से दूर होते ही पुलिस के लिए अपराधी बन गया। ऐसा क्या हुआ कि वह सत्ता की नजरों में खटकने लगा।
दरअसल, विधानसभा चुनाव से लेकर अबतक की सुनील सिंह की गतिविधियों से सारा माजरा समझा जा सकता है। राजनीति के जानकार बताते हैं कि राजनीति में रिश्तों में स्थायित्व का न होना ही इस कहानी की वजह है। यह पटकथा करीब डेढ़ साल पहले से ही लिखी जा रही थी जिसका मोहरा सुनील सिंह को बनना ही था। जानकार बताते हैं कि पूर्वांचल में हिंदू युवा वाहिनी हिंदूत्व की राजनीति का सबसे मजबूत स्तंभ रहा है। भाजपा के कट्टर हिंदूत्व वाले एजेंडे से हटने के बाद पूर्वांचल में हियुवा अपने फायर ब्रांड नेता योगी आदित्यनाथ के आशीर्वाद से खूब फला फूला। आलम यह रहा कि पूर्वांचल में बीजेपी का कोई चुनाव हियुवा के बिना जीतना पिछले एक दशक में मुश्किल दिखने लगा था। किसी भी चुनाव में बीजेपी से टिकट के लिए आकांक्षी एकबारगी गोरखनाथ मंदिर पहुंचकर योगी आदित्यनाथ आशीर्वाद जरूर लेते रहे। हियुवा से जुड़े नेताओं को भी बीजेपी ने खूब तवज्जो दिया और फायर ब्रांड नेता योगी आदित्यनाथ की सिफारिश पर कई विधायक भी बने। इसका नतीजा यह रहा कि भाजपा से अधिक हियुवा के झंडे गोरखपुर और आसपास क्षेत्र में दिखने लगी। हियुवा के लोगों की राजनैतिक महत्वाकांक्षा भी जागने लगी। लेकिन पिछले दो-तीन चुनावों में ऐसी राजनैतिक परिस्थितियां भी उत्पन्न हुई जिस वजह से बीेजेपी को योगी आदित्यनाथ की नाराजगी भी झेलनी पड़ी। अपने लोगों को मनचाही जगह पर टिकट नहीं दिलाने में वह नाकाम रहे। हालांकि, बीजेपी ने इस फायरब्रांड नेता को इस दौरान अपने स्टार प्रचारक के रूप में इस्तेमाल भी किया। इसके बाद यूपी फतह के लिए बीजेपी ने अभियान शुरू हुआ। फिर यूपी बीजेपी का चेहरा बनाए जाने की रसाकशी भी शुरू हुई। बीजेपी का हर क्षेत्रीय क्षत्रप अपने लिए लाॅबिंग करने लगा। इस लाॅबिंग में योगी आदित्यनाथ के लिए हियुवा मुखर हुई। तब प्रदेश अध्यक्ष सुनील सिंह हुआ करते थे। विधानसभा चुनाव के ऐलान तक यह साफ नहीं हो सका था कि चेहरा कौन होगा। राजनैतिक गतिविधियों पर कड़ी नजर रखने वाले लोग बताते हैं कि एक समय ऐसा आया कि लगा बीजेपी संगठन ने योगी आदित्यनाथ और उनके संगठन को एकदम से दरकिनार कर दिया है। यह वही समय था जब हियुवा मुखर होने लगी और योगी को बीजेपी का चेहरा यूपी में बनाने की मांग करने लगी। अंदरूनी खबरें यह भी आने लगी कि मंदिर से ही मिले संकेत के बाद जिलों में हियुवा कार्यकर्ता सक्रिय हो गए और यह बताया जाने लगा कि बीजेपी के खिलाफ हियुवा के कई लोग ताल ठोक सकते हैं।
हालांकि, मंदिर के रणनीतिकार राजनैतिक परिस्थितियों को थाह ही रहे थे कि हियुवा के प्रदेश अध्यक्ष सुनील सिंह, महामंत्री रामलक्ष्मण आदि ने चुनाव के दौरान ही हियुवा प्रत्याशियों का ऐलान शुरू कर दिया। यह इन पदाधिकारियों की राजनैतिक महत्वाकांक्षा थी कि किसी के रणनीति का हिस्सा यह तो साफ नहीं हो सका। लेकिन बीजेपी संगठन में हडकंप मचना लाजिमी था। यूपी जीतने की ख्वाब देखने वाले बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से लेकर प्रदेश प्रभारी ओम माथुर, यूपी बीजेपी के ताकतवर संगठन महामंत्री सुनील बंसल सभी सकते में आ गए। सबकी नजरें गोरखपुर की गतिविधियों पर टिक गई। बीजेपी इस बगावत से परेशान हो उठी। भाजपा के सारे रणनीतिकार अब हियुवा के संरक्षक योगी आदित्यनाथ के शरण में थे। बातचीत शुरू हुई। तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ ने हियुवा में किसी प्रकार की बगावत से इनकार करते हुए बागी नेताओं को संगठन से तत्काल प्रभाव से निकाल दिया गया। जो लोग बीजेपी के खिलाफ चुनाव मैदान में आ चुके थे उनको संगठन के द्वारा मनाया जाने लगा। अमित शाह गोरखपुर पहुंच गए। प्रदेश प्रभारी ओम माथुर तीन दिनों तक गोरखपुर में कैंप किए। हियुवा की बैैठक बुलाई गई, बीजेपी आलाकमान को आश्वस्त किया गया। चुनाव हुए, बीजेपी प्रचंड बहुमत से जीती। लेकिन हियुवा के निकाले गए नेताओं की वापसी नहीं हो सकी।
जानकार बताते हैं कि बीजेपी ने अप्रत्याशित रूप से निर्णय करते हुए योगी आदित्यनाथ को यूपी सरकार की कमान सौंप दी।
इसके बाद निकाले गए नेताओं ने कुछ दिन शांत रहने के बाद एक नया संगठन खड़ा कर लिया। जिलेवार संगठन को खड़ा करने में जुट गए। इधर, लोकसभा चुनाव की बीजेपी ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। सुनील सिंह का हिंदू युवा वाहिनी भारत भी विपक्ष की भूमिका में नजर आ रहा। राजनीति के जानकार बताते हैं कि एक ही विचारधारा वाले संगठनों की सक्रियता किसी न किसी रूप में बीजेपी और हियुवा के लिए काफी दिक्कतदायी हो सकती। रासुका लगाने और उसे दूसरे जिले की जेल में शिफ्ट करने की कवायद को लोग राजनीति में सत्ता के दुरूपयोग से जोड़कर देख रहे।
बहरहाल, हियुवा भारत के सुनील सिंह की पत्नी कुसुम सिंह इस मामले को मुद्दा बनाने में जुट गई हैं। विपक्ष भी देर सवेर इस मामले में मुखर हो इससे इनकार नहीं किया जा सकता।