जल-जंगल-जमीन। इनको किसी प्रकार से नुकसान हमें संकट में डाल सकता है। जंगलों में हरियाली की संकट पर रिपोर्ट की दूसरी किश्त
गोरखपुर। वन्य जीवन पर संकट से मानव जीवन का भी संकट गहरा सकता है। वनों की बदहाली का खामियाजा मानव समाज को भुगतना पड़ सकता है। विकास की अंधी दौड़ और बेपरवाही से वन में उगने वाले दुलर्भ औषधीय पौधे या तो विलुप्त हो गए हैं या विलुप्ति के कगार पर पहुंच गए हैं। वन जीवों का आशियाना उजड़ रहा तो वह भोजन-पानी की तलाश में आबादी की ओर रूख कर रहे जो मानव-वन्य जीव संघर्ष के रूप में सामने आ रहा है। इसमें भी नुकसान वन्य जीवों को उठाना पड़ रहा।
रिपोर्ट के मुताबिक जंगल लगाता सिकुड़ रहे हैं। नदियों के पानी के साथ आ रहा गाद व सिल्ट जंगल के जीवन को तहस-नहस करना शुरू कर दिया है। यूपी के जंगलों का सबसे बुरा हाल है। सिल्ट ने इन जंगलों की पारिस्थितिक तंत्र को तबाह कर दिया है। आलम यह कि जंगल में उगने वाले तमाम दुलर्भ पेड़-पौधे नष्ट होने की कगार पर पहुंच गए हैं। सबसे अधिक नुकसान औषधीय पौधों का पहुंचा है। हजारों की संख्या में दुलर्भ औषधीय पौधे नष्ट हो गए हैं या कगार पर पहुंच चुके हैं।
यही नहीं इन जंगलों पर आए संकट ने वन्य जीवों का आशियाना छीनना शुरू कर दिया है। भोजन-पानी को ये तरस रहे हैं। जंगल के आसपास की आबादी वाले इलाकों में इन वजहों से मानव-वन्य जीव संघर्ष की स्थिति पैदा हो रही है। अभी पिछले कुछ महीनों की ही बात करें तो गोरखपुर-कुशीनगर-महराजगंज के आबादी वाले इलाकों में कभी तेंदुआ तो कभी हिरण आदि जंगल में विचरण करने वाले वन्य जीव भटकते हुए आ गए। तेंदुआ जैसे जानवर जब आबादी में आए तो लोगों को नुकसान पहुंचाया वहीं हिरण आदि भटकते हुए आए तो खुद अपनी जान से हाथ धो बैठेे। हालांकि, कई मामलों में तेंदुआ जैसे खतरनाक जानवर भी लोगों को शिकार बनाने के बाद खुद शिकार बन गए।
पर्यावरणविद् माइक पांडेय बताते हैं कि ये वन्य जीव किसी को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं आते, भोजन-पानी की तलाश में आते हैं। चूंकि, हिरण जैसे जानवर जब आबादी में आते हैं तो फंस जाते हैं लेकिन वहीं तेंदुआ या बाघ जब चारो ओर से घिरता है तो वह हमलावर हो जाता है। वनों में भोजन-पानी का संकट उत्पन्न होने की वजह से ये आबादी की ओर रूख करते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार यूपी के वनों की स्थिति खराब हो चली है। अत्यधिक सिल्टिंग की वजह से वनक्षेत्र को नुकसान पहुंच रहा है। वनस्पति व जीव दोनों इसकी चपेट में हैं। यूपी का शिवालिक-सहारनपुर प्रभाग, मुजफ्फरनगर-बिजनौर प्रभाग, करतनियाघाट-सुहेलवा प्रभाग, काशी वन विहार, ओबरा-रेनूकोट क्षेत्र, चित्रकूट-बांदा क्षेत्र, हमीरपुर-फतेहपुर क्षेत्र, ओराई जालौन हो या गोरखपुर मंडल क्षेत्र, सभी की स्थिति एकजैसी है। पारिस्थितिकी तंत्र तहस-नहस हो रहा। नदियों के पानी के साथ गाद और सिल्ट जंगलों में एकत्र हो रहा। हरियाली कम हो रही। वेटलैंड में इजाफा हो रहा। हरियाली के साथ उर्वरा क्षमता भी वन क्षेत्र के साथ इससे जुड़े क्षेत्रों की कम हो रही। सबसे अधिक नुकसान औषधीय पौधों को पहुंच रहा। जंगल में वन्यजीवों को भोजन-पानी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा, वे आबादी की ओर भाग रहे और जीवन गंवा रहे।
आंतरिक रिपोर्टाें की अगर मानें तो अगर यहीं स्थितियां बनी रही तो हरियाली के लिए उठाए जा रहे सारे कदम बेमानी साबित होंगे क्योंकि अभियानों के माध्यम से उतनी हरियाली हम नहीं ला सकते जितनी विरासत में मिले इन वनों को बचाने से कायम रह सकती है।