
सांसद रामभुआल निषाद के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी। फोटो सोर्स- पत्रिका न्यूज
Non Bailable Warrant Against Samajwadi Party MP:उत्तर प्रदेश के गोरखपुर (Gorakhpur) की एक अदालत ने 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान आचार संहिता उल्लंघन के मामले में सख्ती दिखाते हुए सुल्तानपुर से समाजवादी पार्टी के सांसद रामभुआल निषाद (Rambhual Nishad) के खिलाफ गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी किया है। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ज्ञानेंद्र कुमार की अदालत ने मामले में तेजी लाने और कानूनी प्रक्रिया को प्रभावी ढंग से लागू करने के निर्देश दिए हैं।
यह पूरा मामला 2 मई 2019 का है, जब पिपराइच (Pipraich) थाना क्षेत्र में केस दर्ज किया गया था। आरोप है कि लोकसभा चुनाव के दौरान सांसद अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ आचार संहिता का उल्लंघन करते पाए गए थे। चुनावी नियमों के उल्लंघन को गंभीर मानते हुए इस पर विधिक कार्रवाई शुरू की गई थी, लेकिन समय के साथ इसमें अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी।
अदालत ने अपने आदेश में साफ कहा कि पहले जारी किए गए समन और अन्य न्यायिक आदेशों का पालन नहीं किया गया, जो गंभीर लापरवाही को दर्शाता है। इसी को देखते हुए कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया और गैर-जमानती वारंट जारी करने का फैसला लिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह के मामलों में देरी न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करती है, जिसे अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 82 के तहत आगे की कार्रवाई शुरू करने का आदेश दिया है। इसके तहत आरोपी को भगोड़ा घोषित करने की प्रक्रिया भी शुरू की जा सकती है, यदि वह अदालत के सामने पेश नहीं होता है। साथ ही, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) और संबंधित थाना प्रभारी को निर्देश दिए गए हैं कि वे समयबद्ध तरीके से सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन सुनिश्चित करें।
अदालत ने अपने आदेश में अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ (Ashwini Kumar Upadhyay vs Union of India) मामले का भी जिक्र किया। इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने जनप्रतिनिधियों से जुड़े आपराधिक मामलों में तेजी से सुनवाई और सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए थे। इसी आधार पर निचली अदालत ने पुलिस और प्रशासन को मामले में सक्रियता बढ़ाने के निर्देश दिए हैं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यह मामला जनप्रतिनिधि (MP-MLA) से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसे विशेष प्राथमिकता के साथ निपटाया जाना चाहिए। अदालत ने जोर देकर कहा कि ऐसे मामलों में देरी लोकतांत्रिक व्यवस्था और कानून के शासन पर सवाल खड़े करती है।
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Published on:
03 May 2026 08:42 am
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