ग्वालियर. शहर की सफाई व्यवस्था और लैंडफिल साइट पर जमा कचरे को हटाने के लिए दायर जनहित याचिका पर 38 महीनों में 43 सुनवाई हो चुकी हैं, लेकिन हालात जस के तस बने हुए हैं। हाईकोर्ट की लगातार सख्ती और निर्देशों के बावजूद नगर निगम न तो लैंडफिल साइट से कचरा हटा पाया है और […]
ग्वालियर. शहर की सफाई व्यवस्था और लैंडफिल साइट पर जमा कचरे को हटाने के लिए दायर जनहित याचिका पर 38 महीनों में 43 सुनवाई हो चुकी हैं, लेकिन हालात जस के तस बने हुए हैं। हाईकोर्ट की लगातार सख्ती और निर्देशों के बावजूद नगर निगम न तो लैंडफिल साइट से कचरा हटा पाया है और न ही शहर के सभी वार्डों में नियमित कचरा उठाने की व्यवस्था सुनिश्चित कर सका है। स्थिति यह है कि निगम अब तक केवल रिपोर्ट पेश कर फाइल का आकार बढ़ाता रहा, जबकि जमीन पर सुधार न के बराबर दिखा।
जनहित याचिका जनवरी 2023 में सरताज ङ्क्षसह द्वारा दायर की गई थी। मांग थी कि शहर की सफाई व्यवस्था सुधारी जाए और लैंडफिल साइट पर जमा हजारों टन कचरे का वैज्ञानिक निस्तारण किया जाए। कोर्ट ने समय-समय पर कड़े निर्देश दिए, अधिकारियों को जवाबदेह बनाया और निगरानी के लिए दो न्यायमित्र भी नियुक्त किए, लेकिन ठोस बदलाव अब तक नहीं दिखा।
तीन वर्षों में कई बार इंदौर मॉडल का जिक्र हुआ। ग्वालियर से टीमें इंदौर भेजी गईं और वहां से विशेषज्ञ भी आए। सुझाव दिए गए, योजनाएं बनीं, लेकिन अमल नहीं हो सका।
हाईकोर्ट में पेश रिपोर्टों और सुनवाई के दौरान सामने आया कि शहर में 600 वाहनों की जरूरत, लेकिन केवल 240 से काम हो रहा है। 66 में से सिर्फ 36 वार्ड ही कवर हो पा रहे हैं, 30 वार्डों में नियमित कचरा उठाव नहीं, यानी शहर का बड़ा हिस्सा अब भी बदहाल सफाई व्यवस्था से जूझ रहा है।
नगर निगम के काम ऐसे हैं कि सिर्फ कागजों में सफाई दिखा रहे हैं। कई सलाहकार नियुक्त कर लिए हैं, जिन्हें सिर्फ भुगतान किया जा रहा है। सफाई में कोई बदलाव नहीं हुआ है, स्थिति जस की तस है, अधिकारी काम करना नहीं चाहते हैं।
सुनील जैन, न्यायमित्र