ग्वालियर

सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर कर हाईवे किनारे हथियाई थी 24 बीघा जमीन, ग्वालियर कलेक्टर ने फिर से घोषित की शासकीय

भू-माफिया और सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे के खिलाफ जिला प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई करते हुए ग्राम सातऊ की करीब 24 बीघा (4.996 हेक्टेयर) बेशकीमती भूमि को दोबारा शासकीय घोषित कर

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Jun 04, 2026
gwalior court
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ग्वालियर। भू-माफिया और सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे के खिलाफ जिला प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई करते हुए ग्राम सातऊ की करीब 24 बीघा (4.996 हेक्टेयर) बेशकीमती भूमि को दोबारा शासकीय घोषित कर दिया है। कलेक्टर रुचिका चौहान के न्यायालय ने संबंधित तहसीलदार को तत्काल प्रभाव से भूमि को शासन के खाते में दर्ज करने तथा 15 दिन के भीतर अतिक्रमण मुक्त कराने के निर्देश दिए हैं। इस कार्रवाई से करोड़ों रुपए मूल्य की सरकारी जमीन को निजी कब्जे से मुक्त कराने का रास्ता साफ हो गया है।

कलेक्टर न्यायालय ने मामले की सुनवाई के दौरान पूर्व में अनुविभागीय राजस्व अधिकारी (एसडीओ) द्वारा पारित आदेश को मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा-50 के तहत निरस्त कर दिया। न्यायालय ने पाया कि भूमि के स्वामित्व संबंधी रिकॉर्ड में गंभीर अनियमितताएं हुई थीं।

जांच में खुला रिकॉर्ड हेरफेर का खेल

मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर ने एसडीओ लश्कर से विस्तृत जांच कराई। जांच में सामने आया कि ग्राम सातऊ स्थित सर्वे क्रमांक 168/2/2 की भूमि पुरानी मिसिल बंदोबस्त संवत् 1997 से लेकर संवत् 2019 तक ’पड़ती कदीम’ यानी शासकीय बंजर भूमि के रूप में दर्ज थी।

हालांकि संवत् 2020 से 2024 के बीच बिना किसी सक्षम अधिकारी के आदेश अथवा वैध दस्तावेज के इस जमीन पर किशनलाल पुत्र काशीराम गुर्जर का नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कर दिया गया। जांच में यह भी पाया गया कि भूमि मुख्य हाईवे से लगी होने के कारण अत्यंत मूल्यवान है।

हाईवे किनारे करोड़ों की जमीन पर किया गया कब्जा

स्थलीय निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने पाया कि भूमि के दो ओर अस्थायी सीमेंट बाउंड्रीवॉल खड़ी कर दी गई थी। साथ ही संबंधित पक्ष द्वारा जमीन पर कृषि गतिविधियां संचालित कर कब्जा स्थापित किया जा रहा था। हाईवे से सटी होने के कारण भूमि की बाजार कीमत करोड़ों रुपए आंकी जा रही है।

सुनवाई में नहीं मिले मालिकाना हक के सबूत

कलेक्टर न्यायालय ने जांच रिपोर्ट के आधार पर संबंधित पक्षकारों को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने का अवसर दिया। सुनवाई के दौरान खतौनी और अन्य राजस्व अभिलेखों की जांच की गई, लेकिन भूमि से संबंधित कोई वैध खाता या स्वामित्व रिकॉर्ड नहीं मिला।

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह रहा कि संबंधित पक्षकार भूमि पर अपने अधिकार के समर्थन में कोई पट्टा, वैध आदेश या अन्य कानूनी दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके। इसके बाद न्यायालय ने भूमि को उसके मूल स्वरूप में शासकीय घोषित करते हुए राजस्व रिकॉर्ड में संशोधन और अतिक्रमण हटाने के आदेश जारी कर दिए।

15 दिन में हटेगा कब्जा

कलेक्टर न्यायालय के आदेश के बाद संबंधित तहसीलदार को निर्देश दिए गए हैं कि भूमि को शासन के खाते में दर्ज कराते हुए 15 दिनों के भीतर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई सुनिश्चित करें। प्रशासन का कहना है कि सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे और रिकॉर्ड में हेरफेर करने वालों के खिलाफ आगे भी सख्त कार्रवाई जारी रहेगी।

Published on:
04 Jun 2026 05:35 pm