4 जून 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

रजिस्टर्ड रजिस्ट्री को चुनौती देना आसान नहीं, गलत साबित करने की जिम्मेदारी विरोध करने वाले की है : हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने संपत्ति विवाद से जुड़े मामले में स्पष्ट किया कि विधिवत रजिस्टर्ड दस्तावेज को कानूनन सही माना जाएगा। यदि कोई व्यक्ति उसकी वैधता पर सवाल उठाता है, तो उसे ही यह साबित

2 min read
Google source verification
gwalior court

gwalior court

ग्वालियर. हाईकोर्ट ने संपत्ति विवाद से जुड़े मामले में स्पष्ट किया कि विधिवत रजिस्टर्ड दस्तावेज को कानूनन सही माना जाएगा। यदि कोई व्यक्ति उसकी वैधता पर सवाल उठाता है, तो उसे ही यह साबित करना होगा कि दस्तावेज गलत, फर्जी या अवैध है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने ङ्क्षभड जिले के एक मकान विवाद में बहू की द्वितीय अपील खारिज कर दी और खरीदार के पक्ष में दिए गए निचली अदालतों के फैसले को बरकरार रखा।

जस्टिस आशीष श्रोती की एकल पीठ ने कहा, केवल संदेह या जानकारी नहीं होने का दावा किसी रजिस्टर्ड दस्तावेज को अवैध नहीं बना सकता। दस्तावेज को गलत साबित करने साक्ष्य प्रस्तुत करना जरूरी है।

1990 में हुई थी रजिस्ट्री, खरीदार को मिला था कब्जा

मामला ङ्क्षभड जिले का है। बुद्धाराम नामक व्यक्ति ने 6 सितंबर 1990 को अपना मकान 40 हजार रुपए में रामविलास देपुरिया को रजिस्टर्ड विक्रय पत्र के जरिए बेच दिया था। दस्तावेज में यह भी दर्ज था कि पूरी राशि प्राप्त कर ली गई है और मकान का कब्जा खरीदार को सौंप दिया गया है। उसी दिन बुद्धाराम ने अपनी कृषि भूमि की भी रजिस्ट्री रामविलास के नाम की थी।

बुद्धाराम की 1 जनवरी 2014 को मृत्यु हो गई। रामविलास के अनुसार, इसके बाद बुद्धाराम की बहू गुड्डी उर्फ रामवती ने कुछ समय रहने के लिए मकान मांगा। मानवीय आधार पर उसे रहने की अनुमति दे दी गई, लेकिन बाद में मकान खाली करने से उसने इनकार कर दिया और खरीदार के मालिकाना हक को चुनौती दे दी। इसके बाद रामविलास ने वर्ष 2018 में अदालत का दरवाजा खटखटाया।

बहू ने उठाए थे ये सवाल

प्रतिवादी पक्ष ने दलील दी कि वर्ष 1990 में हुई रजिस्ट्री के बाद खरीदार ने करीब 28 वर्षों तक कोई कार्रवाई नहीं की। न तो अपने नाम से रिकॉर्ड दुरुस्त कराया और न ही कब्जे का कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत किया। यह भी कहा गया कि 40 हजार रुपए के भुगतान का कोई अलग से प्रमाण रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं है।

कोर्ट बोला- जानकारी नहीं होना अलग बात, रजिस्ट्री गलत होना अलग

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि रजिस्ट्री में स्पष्ट रूप से लिखा है कि विक्रेता को पूरी राशि मिल चुकी थी और कब्जा भी सौंप दिया गया था। गवाहों ने भी इस तथ्य की पुष्टि की।

अदालत ने यह भी माना कि जिरह के दौरान बहू ने रजिस्ट्री के अस्तित्व से इनकार नहीं किया, बल्कि सिर्फ यह कहा कि उसे इसकी जानकारी नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि रजिस्ट्री के समय उसके मौजूद न होने के कारण ऐसा कहना स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन इससे दस्तावेज की वैधता प्रभावित नहीं होती।

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

अदालत ने कहा कि कानून रजिस्टर्ड दस्तावेजों के पक्ष में वैधानिक अनुमान देता है। इसलिए जो व्यक्ति ऐसे दस्तावेज का विरोध करता है, उसी पर यह साबित करने की जिम्मेदारी होती है कि वह फर्जी, अवैध या प्रभावहीन है। चूंकि प्रतिवादी ऐसा कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सकी, इसलिए उसकी द्वितीय अपील खारिज कर दी गई।