
Gwalior news: मध्यप्रदेश के ग्वालियर शहर में साइबर ठग लोगों को लूटने के लिए तमाम हथकंडे अपना रहे हैं। ठगों ने अब ऑनलाइन गेमिंग को ठगी का बड़ा हथियार बनाया है। दरअसल, ठगों को पता है कि ऑनलाइन गेम के जाल में फंसने वालों का कुनबा बड़ा है। इसलिए ठग ऑनलाइन गेमिंग के फर्जी ऐप बनाकर लोगों को फंसा रहे हैं। साइबर एक्सपर्ट भी मानते हैं कि ऑनलाइन गेमिंग के नाम पर साइबर ठगी केवल तकनीकी सेंधमारी नहीं है, बल्कि यह लोगों के मनोविज्ञान (लालच, लत और डर) के साथ खेलने वाला एक संगठित नेटवर्क चला रहे हैं।
-ठगों का नेटवर्क इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब और टेलीग्राम पर गेम खेलो और घर बैठे पैसा कमाओ का लुभावने वीडियो और प्रयोजित विज्ञापन चला रहे हैं।
-ठगों के फर्जी गेमिंग ऐप्स गूगल प्ले स्टोर या एप्पल ऐप स्टोर पर नहीं होते। इन्हें वाट्सऐप या टेलीग्राम लिंक के जरिए सीधे फोन में एपीके फाइल के जरिए डाउनलोड कराया जाता है।
-फ्री गेमिंग इनाम का लालच देकर जाल में फंसने वालों को खेलने के लिए मुफ्त स्किन्स, हथियार या इन-गेम करेंसी देने के बहाने फिशिंग लिंक भेजते हैं।
ऑनलाइन गेमिंग के जाल में फंसकर ठगे जाने वालों की गिनती लगातार बढ़ रही है। पुलिस की साइबर सेल के सामने हर दिन करीब 4 से 5 लोग इस हथकंडे से ठगे जाने वाले सामने आ रहे हैं।
शुरुआत में ठगों का नेटवर्क गेम खेलने वाले को 100 या 500 रुपए का इनाम जिताता है। इसके लिए गेम का बैकएंड एल्गोरिदम तैयार किया जाता है और शुरू में जीती हुई छोटी रकम को तुरंत खिलाड़ी के बैंक खाते में ट्रांसफर कर यह भरोसा बनाया जाता है कि ऐप असली है। भरोसा जमते ही खिलाड़ी से कहा जाता है कि अगर वह वीआइपी लेवल या मेगा टूर्नामेंट में हिस्सा लेगा, तो लाखों रुपए जीतेगा। झांसे में आकर फंसने वाले हजारों, लाखों रुपए दांव पर लगाकर ठगे जाते हैं। जालसाज स्क्रीन पर लाखों रुपए की जीत का हिसाब तक दिखाते हैं, लेकिन दांव लगाने वाले इस रकम को विड्राल नहीं कर पाते।
ऑनलाइन गेमिंग के जाल में फंसने वाले शर्तिया ठगी का शिकार होते हैं। क्योंकि ठग जब यूजर थर्ड-पार्टी लिंक से गेम डाउनलोड करता है, तो बैकग्राउंड में 'रिमोट एक्सेस ट्रोजन इंस्टॉल हो जाता है। यह मैलवेयर यूजर के फोन के एसएमएस कॉन्टैक्ट्स और नेट बैंकिंग ओटीपी को ठगों के सर्वर तक पहुंचा देता है, जिससे बैंक खाता सीधे खाली हो जाता है।- संजीव नयन शर्मा, डीएसपी स्टेट साइबर सेल ग्वालियर