ग्वालियर लोकसभा चुनाव में भाजपा-कांग्रेस दोनों ही पार्टियों को सता रहा भितरघात का खतरा...।
लोकसभा चुनाव-2024 में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशियों को भितरघात का खतरा है। इसलिए सभी फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं। भाजपा के अब तक के लोकसभा प्रत्याशियों को देखें तो वर्तमान प्रत्याशी को दमदार नहीं मान रहे हैं। इसलिए अंदरूनी तौर पर दूरी बनाए हुए हैं। वहीं कांग्रेस प्रत्याशी से उनकी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता नाराज है। कांग्रेस प्रत्याशी की जिलाध्यक्ष से नाराजगी भी जग जाहिर है। हालांकि दोनों ही पार्टियों के प्रत्याशी सबको साधने में लगे हैं। क्योंकि दोनों प्रत्याशी विधानसभा चुनाव में हार चुके हैं और अब लोकसभा में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।
ग्वालियर लोकसभा सीट में आठ विधानसभाएं आती है। जिसमें ग्वालियर पूर्व, दक्षिण, ग्वालियर और ग्रामीण का काफी हिस्सा शहर से जुड़ा है। हालांकि इन क्षेत्रों में भाजपा की पकड़ अच्छी रही है। इसलिए भाजपा शहर क्षेत्र का ही प्रत्याशी मैदान में उतरती रही है। भाजपा ने ग्वालियर लोकसभा सीट से शहरी पृष्ठ भूमि वाले नेता जयभान सिंह पवैया, नरेंद्र सिंह तोमर, यशोधरा राजे सिंधिया और विवेक नारायण शेजवलकर को मैदान में उतारा और सभी ने जीत भी हासिल की थी। भाजपा ने पहली बार ग्वालियर ग्रामीण से विधायक रह चुके भारत सिंह कुशवाहा को प्रत्याशी बनाकर नया प्रयोग किया है। फिलहाल शहर में चुनाव को लेकर जोश और उत्साह नजर नहीं आ रहा।
तोमर-सिंधिया गुट में बंटी नजर आ रही है। भाजपा प्रत्याशी पूर्व केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर खेमे से आते हैं और वे ही उनके प्रचार में जुटे हुए हैं। वहीं सिंधिया खेमे के नेता और कार्यकर्ता गुना-शिवपुरी का मोर्चा संभाले हुए हैं। सिंधिया पिछली बार गुना से हार चुके हैं, इसलिए वे इस बार कोई कसर नहीं छोडऩा चाहते हैं इसलिए वे अपने सभी समर्थकों के साथ पूरी ताकत से जुटे हुए हैं। इस कारण विधायक मोहन सिंह राठौर, प्रद्यु्म्न सिंह तोमर, इमरती देवी, मुन्नालाल गोयल जैसे नेता ग्वालियर छोड़कर गुना-शिवपुरी में प्रचार करने में जुटे हैं। जिसका नुकसान सीधे तौर पर ग्वालियर लोकसभा में हो सकता है। भारत सिंह का शहर में फोकस है इसलिए वे अब नेताओं को मनाने में जुटे हैं, साथ ही समाज को जोडऩे का प्रयास कर रहे हैं।
विधानसभा चुनाव हार चुके लोकसभा प्रत्याशी प्रवीण पाठक को टिकट मिलने से कई कांग्रेसी नाराज है। जब पाठक विधायक थे तो पार्टी के कार्यक्रमों से और पार्टी के प्रमुख नेताओं से दूरी बनाकर रखते थे। पाठक और जिलाध्यक्ष की भी नहीं बनती थी, लेकिन टिकट मिलने के बाद वे सबसे पहले नाराजगी दूर करने के लिए उनके घर पहुंचे थे। पाठक से नाराजगी के कारण कई कांग्रेसियों ने तो पार्टी तक छोड़ दी। पाठक का नाम घोषित करने में पार्टी ने काफी समय ले लिया, इस कारण भी क्षेत्र में जाने का समय भी कम मिला। पाठक ग्रामीण में अपनी पैठ बनाने के लिए दिन-रात एक किए हैं। उनके समर्थन में अभी तक कोई बड़े नेता की सभा नहीं हुई, जो परेशानी का कारण बन रहा है।