
ग्वालियर. सरकारी स्कूलों में नौनिहालों को बेहतर शिक्षा और सुविधाएं देने के दावों की जमीनी हकीकत बेहद ङ्क्षचताजनक है। शैक्षणिक सत्र शुरू हुए तीन महीने से अधिक का समय बीत चुका है और छमाही परीक्षाएं सिर पर हैं, लेकिन शिक्षा विभाग की घोर लापरवाही के चलते जिले के 91 हजार से ज्यादा स्कूली बच्चों के हाथ अब भी खाली हैं। पहली से आठवीं कक्षा तक के इन मासूमों को न तो पढ़ने के लिए पूरा किताबों का सेट मिला है और न ही स्कूल ड्रेस (गणवेश) के लिए मिलने वाली सरकारी सहायता। जिले के शासकीय स्कूलों में कक्षा 1 से 8वीं तक कुल 91,160 विद्यार्थी पंजीकृत हैं। विडंबना यह है कि कई स्कूलों में अब तक किताबों की पहली खेप भी नहीं पहुंची है। जहां वितरण हुआ भी है, वहां बच्चों को 2 या 3 किताबें देकर पल्ला झाड़ लिया गया। सबसे बदतर स्थिति सरकारी अंग्रेजी माध्यम (सीएम राइज व अन्य) स्कूलों की है, जहां सत्र शुरू होने के बाद से अब तक एक भी विषय की किताब सप्लाई नहीं हो सकी है। बच्चे रोज खाली बस्ता टांगकर स्कूल आते हैं और बैरंग लौट जाते हैं।
फटी यूनिफॉर्म में स्कूल जा रहे बच्चे
नियमानुसार प्रत्येक छात्र-छात्रा को गणवेश के लिए 600 की राशि बैंक खाते में डीबीटी के जरिए भेजी जानी थी। आधा सत्र बीत जाने के बावजूद यह बजट जारी नहीं हुआ। मजबूरन गरीब बच्चे पुरानी और फटी ड्रेस में स्कूल जाने को विवश हैं। अभिभावक जब स्कूलों में शिक्षकों से सवाल करते हैं, तो शिक्षक बजट न आने की बेबसी जताकर पल्ला झाड़ लेते हैं।
इनका कहना है
हमने शासन को किताबों और ड्रेस राशि के लिए प्रस्ताव बनाकर भेज दिया था। कई स्कूलों में किताबें पहुंच चुकी हैं, शेष में भी जल्द वितरण हो जाएगा। जहां तक ड्रेस के पैसे का सवाल है, तो यह आवंटन शासन स्तर से सीधे जारी होता है।
रविंद्र तोमर, डीपीसी, ग्वालियर