
Gwalior news: एमपी में ग्वालियर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने अनुकंपा नियुक्ति के मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि अनुकंपा नियुक्ति नियमित भर्ती का वैकल्पिक जरिया या अधिकार नहीं है। यह दिवंगत कर्मचारी के परिवार को अचानक आए आर्थिक संकट से उबारने के लिए दी जाने वाली तात्कालिक सहायता है। जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की बेंच ने कहा कि यदि मृतक कर्मचारी का परिवार 21 साल तक सफलतापूर्वक जीवन यापन कर चुका है तो इतने लंबे समय बाद अनुकंपा नियुक्ति देने का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। कोर्ट ने सिंगल बेंच द्वारा चतुर्थ श्रेणी पद पर नियुक्ति पर विचार करने के दिए आदेश को निरस्त कर दिया।
याचिकाकर्ता राजकुमार परिहार के पिता की सेवाकाल के दौरान 8 दिसंबर 2005 को मृत्यु हो गई थी। इसके बाद बड़े भाई ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। बिजली कंपनी ने 2017 में चतुर्थ श्रेणी पद रिक्त नहीं होने के आधार पर आवेदन खारिज कर दिया था। बड़े भाई ने इस निर्णय को चुनौती नहीं दी।
बाद में राजकुमाया नियुक्ति के लिए आवेदन किया। बिजली कंपनी ने फरवरी 2020 में उसे जरूरी सीपीसीटी परीक्षा पास करने के लिए तीन साल की मोहलत दी थी। हालांकि उसने परीक्षा पास करने का प्रयास नहीं किया और सीधे हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी।
सिंगल बेंच ने 12 सितंबर 2025 को बिजली कंपनी को चतुर्थ श्रेणी पद पर नियुक्ति देने पर विचार करने का निर्देश दिया था। इसके खिलाफ बिजली कंपनी ने डिवीजन बेंच में रिट अपील दायर की। सुनवाई के बाद डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच का आदेश निरस्त कर दिया।
डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य मृतक कर्मचारी के परिवार को तत्काल आर्थिक के सामान्य रूप से जीवन यापन करने के बाद संकट से राहत देना है। लंबे समय तक परिवार नियुक्ति की मांग इस मूल उद्देश्य के अनुरूप नहीं मानी जा सकती।