मैसर्स रीन वॉटर टेक प्राइवेट लिमिटेड को साडा क्षेत्र के 28 गांवों में जल आपूर्ति के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करने का ठेका मिला था। कंपनी का आरोप है कि वन क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण न होने और भारी बारिश के कारण काम में देरी हुई, लेकिन विभाग ने बिना सुनवाई का अवसर दिए 9 फरवरी 2026 को ठेका समाप्त कर दिया
ग्वालियर ञ्च पत्रिका. हाईकोर्ट की युगल पीठ ने ‘साडा’ मल्टी विलेज पेयजल योजना से जुड़े विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस जीएस अहलुवालिया एवं जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की युगलपीठ ने आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल द्वारा याचिकाकर्ता कंपनी की रेफरेंस याचिका और अंतरिम राहत की अर्जी खारिज करने के आदेश को अवैध मानते हुए रद्द कर दिया।
कोर्ट ने अब ट्रिब्यूनल को इस मामले पर नए सिरे से सुनवाई करने और स्थगन आवेदन पर निर्णय लेने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब अनुबंध खत्म करने का निर्णय उच्च अधिकारियों (मैनेङ्क्षजग डायरेक्टर) द्वारा पहले ही लिया जा चुका हो, तो विभाग के पास अपील करना केवल एक औपचारिकता रह जाती है। कोर्ट ने कोई भी अपने मामले में खुद जज नहीं हो सकता के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में याचिकाकर्ता को विभाग के पास भेजना ‘न्याय का मखौल’ होगा। मैसर्स रीन वॉटर टेक प्राइवेट लिमिटेड को साडा क्षेत्र के 28 गांवों में जल आपूर्ति के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करने का ठेका मिला था। कंपनी का आरोप है कि वन क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण न होने और भारी बारिश के कारण काम में देरी हुई, लेकिन विभाग ने बिना सुनवाई का अवसर दिए 9 फरवरी 2026 को ठेका समाप्त कर दिया। इसके खिलाफ कंपनी ने आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया था, जिसने तकनीकी आधार पर याचिका खारिज कर दी थी।
पेयजल योजना हजारों ग्रामीणों के हित से जुड़ी है
हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द कर दिया है, लेकिन नई निविदा प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने तर्क दिया कि पेयजल योजना हजारों ग्रामीणों के हित से जुड़ी है और ठेकेदार के संभावित आर्थिक नुकसान के कारण सार्वजनिक कार्य को नहीं रोका जा सकता। यदि ठेका गलत तरीके से रद्द पाया जाता है, तो कंपनी भविष्य में मुआवजे की हकदार होगी।