
Gwalior news: मध्यप्रदेश के ग्वालियर शहर में उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने वैवाहिक विवाद की मध्यस्थता प्रक्रिया में अधिवक्ता के हस्तक्षेप को गंभीरता से लिया है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मध्यस्थता प्रक्रिया वैधानिक होती है और इसमें वकीलों का हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। एक अधिवक्ता पर मध्यस्थता रोकने 3 लाख का हर्जाना लगाया गया। राशि 2 सितंबर 2026 तक रजिस्ट्री में जमा करने का आदेश किया है। मामला पति राकेश और पत्नी विभा (परिवर्तित नाम) के पारिवारिक विवाद से संबंधित था।
प्रकरण लंबे समय से हाईकोर्ट में लंबित था। वरिष्ठ अधिवक्ता व मध्यस्थ पदम सिंह के समक्ष सुलझाने के लिए भेजा। 25 अगस्त को हुई बैठक में दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से तलाक और 10 लाख स्थायी भरण-पोषण देने पर समझौता हुआ। मध्यस्थ की रिपोर्ट के अनुसार, जब समझौता अंतिम चरण में था, तब पति के वकील ने प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया और अपने पक्षकार को समझौते पर हस्ताक्षर करने से रोका, जिससे सफल हो रही मध्यस्थता विफल हो गई।
हाईकोर्ट ने वकील से मध्यस्थता प्रक्रिया में भूमिका और सहमति बनने के बाद हस्तक्षेप के अधिकार पर जवाब मांगा था। वकील ने माफी मांगते हुए भविष्य में न्यायिक प्रक्रिया में बाधा न डालने का वचन दिया। न्यायालय ने गांधीजी के विचार 'पाप से घृणा होनी चाहिए, पापी से नहीं' का उल्लेख करते हुए सुधरने की मोहलत दी, लेकिन हर्जाना भी लगाया। कहा, गलती दोबारा ना हो।
हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ की सिंगल बेंच ने वसीयत के आधार पर जमीन के नामांतरण को लेकर महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक ही जमीन को लेकर दो परस्पर विरोधी वसीयत सामने आने पर तहसीलदार, एसडीएम या कमिश्नर को उनकी वैधता तय करने का अधिकार नहीं है। ऐसे विवाद का निर्णय केवल सक्षम सिविल कोर्ट कर सकता है। जस्टिस पवन कुमार द्विवेदी की बेंच ने शिवपुरी जिले की नरवर तहसील के ग्राम सिकंदर के मामले में एडिशनल कमिश्नर ग्वालियर, एसडीएम नरवर और तहसीलदार के तीनों आदेश निरस्त कर दिए। साथ ही राजस्व विभाग को निर्देश दिया कि जमीन के रिकॉर्ड में 11 फरवरी 2020 से पहले की मूल स्थिति बहाल की जाए।