
ग्वालियर. तानसेन की नगरी ग्वालियर में इन दिनों संगीत की तान कम और सडक़ों पर गाडिय़ों के हिचकोले खाने की आवाजें ज्यादा सुनाई दे रही हैं। शहर की सडक़ों का हाल अब किसी से छुपा नहीं है। विकास के दावों और स्मार्ट सिटी के विज्ञापनों के बीच ग्वालियर की सडक़ें आम जनता की जेब पर भारी पड़ रही हैं। हालत यह हो चुकी है कि जो फोर व्हीलर और टू व्हीलर के टायर आराम से तीन से चार साल का सफर तय कर लेते थे, वे अब महज एक साल में ही हांफ रहे हैं। सडक़ों के घटते मानक स्तर ने वाहन चालकों की कमर तो तोड़ी ही है, साथ ही उनके टायरों को भी वक्त से पहले घिसा दिया है।
एक दौर था जब ग्वालियर में पीडब्ल्यूडी और नगर निगम की सडक़ें एक तय मानक (स्टैंडर्ड) पर बनती थीं। डामर और गिट्टी का तालमेल ऐसा होता था कि सडक़ें सालों-साल चलती थीं और टायर सुरक्षित रहते थे। लेकिन आज की तारीख में सडक़ निर्माण से गुणवत्ता के मानक गायब होते नजर आ रहे हैं।
इवेंट प्लानर गिरीश शर्मा बताते हैं कि सडक़ें बनते ही पहली बारिश में बह जाती हैं। डामर गायब हो जाता है और नुकीली गिट्टियां ऊपर आ जाती हैं। ये सडक़ें नहीं, बल्कि टायर घिसने के कटर बन चुकी हैं। हर रोज आने-जाने में ऐसा लगता है जैसे गाडिय़ां सडक़ पर नहीं, बल्कि पत्थरों के पहाड़ पर चल रही हों। इसके चलते टायर बहुत जल्दी खराब हो रहे हैं।’’