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एससी-एसटी एक्ट: मुआवजे के लिए पीड़िता को देना होगा शपथ पत्र, एमपी हाइकोर्ट का फैसला

Madhya Pradesh High Court: एमपी हाईकोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के तहत मिलने वाले मुआवजे के दुरुपयोग पर सख्ती दिखाई है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि मुआवजा पाने से पहले पीड़िता को शपथ पत्र देना होगा।
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ग्वालियर

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Astha Awasthi

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Updated: 28 Jun 2026, 5:52 PM IST

MP High Court Decision: एमपी हाइकोर्ट का फैसला (Photo Source - Patrika)

MP High Court Decision: एमपी हाइकोर्ट का फैसला (Photo Source - Patrika)

MP High Court Decision:मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मिलने वाले मुआवजे के दुरुपयोग को रोकने के लिए एक बेहद अहम और सख्त फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कई मामलों में देखा गया है कि पीड़िता मुआवजा राशि प्राप्त करने के बाद ट्रायल कोर्ट के समक्ष मुकर (होस्टाइल) जाती है या आरोपी से समझौता कर लेती है।

कोर्ट ने कहा कि जनता की गाढ़ी कमाई (पब्लिक एक्सचेकर) के पैसे का इस तरह दुरुपयोग नहीं होने दिया जा सकता है। जस्टिस विशाल मिश्रा की बेंच ने एक पीड़िता की याचिका का निपटारा करते हुए निर्देश दिया कि अब मुआवजा राशि जारी करने से पहले पीड़िता को एक शपथ पत्र (एफिडेविट) देना होगा। इस शपथ पत्र में पीड़िता को यह वचन देना होगा कि वह अदालत में अपने बयानों से मुकरेगी नहीं और न ही आरोपी से कोई समझौता करेगी।

मुकरीं तो कोर्ट लेगा संज्ञान

हाईकोर्ट जबलपुर बैंच ने कहा है, यदि मुआवजा राशि प्राप्त करने बाद पीड़िता अदालत में मुकर जाती है, तो उसे ट्रायल कोर्ट का फैसला आने के 30 दिनों के भीतर पूरी मुआवजा राशि सरकारी खजाने में वापस लौटानी होगी। यदि राशि वापस नहीं की जाती है, तो प्रशासनिक अधिकारियों को मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता के प्रावधानों के तहत जबरन वसूली करने की पूरी छूट होगी। इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) को भी निर्देशित किया है कि यदि पीड़िता मुकरती है या समझौता करती है, तो उसके खिलाफ झूठा और फर्जी मामला दर्ज कराने के आरोप में कानूनी संज्ञान (कॉग्निजेंस) लिया जाए।

यह है पूरा मामला

जबलपुर के खमरिया थाने में वर्ष 2022 में एक पीड़िता ने आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म और एससी-एसटी एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कराया था। पुलिस द्वारा कोर्ट में चार्जशीट पेश की जा चुकी है। अनुसूचित जनजाति वर्ग से ताल्लुक रखने वाली पीड़िता ने नियमों के तहत कुल 5 लाख रुपए के मुआवजे में से 75 फीसदी राशि (चार्जशीट के चरण तक मिलने वाली राशि) की मांग को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, क्योंकि उसे अब तक केवल 75,000 रुपए ही मिले थे।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील ने दलील दी कि आमतौर पर चार्जशीट दाखिल होने तक 75 फीसदी मुआवजा दे दिया जाता है, जिसके बाद कई मामलों में पीड़िताएं मुकर जाती हैं। कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता को आदेश दिया है कि वह 15 दिनों के भीतर सक्षम अधिकारियों के समक्ष अपना शपथ पत्र प्रस्तुत करे। शपथ पत्र मिलने के 30 दिनों के भीतर अधिकारी पीड़िता के आवेदन पर विचार कर नियमानुसार मुआवजा राशि जारी करेंगे।