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ग्वालियर में सडक़ें नहीं ‘टायर कटर’ बिछे हैं!… 3 साल की उम्र वाले टायर 12 महीने में ही मांग रहे हैं रिटायरमेंट

तानसेन की नगरी ग्वालियर में इन दिनों संगीत की तान कम और सडक़ों पर गाडिय़ों के हिचकोले खाने की आवाजें ज्यादा सुनाई दे रही हैं। शहर की सडक़ों का हाल अब किसी ...
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gwalior road

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ग्वालियर. तानसेन की नगरी ग्वालियर में इन दिनों संगीत की तान कम और सडक़ों पर गाडिय़ों के हिचकोले खाने की आवाजें ज्यादा सुनाई दे रही हैं। शहर की सडक़ों का हाल अब किसी से छुपा नहीं है। विकास के दावों और स्मार्ट सिटी के विज्ञापनों के बीच ग्वालियर की सडक़ें आम जनता की जेब पर भारी पड़ रही हैं। हालत यह हो चुकी है कि जो फोर व्हीलर और टू व्हीलर के टायर आराम से तीन से चार साल का सफर तय कर लेते थे, वे अब महज एक साल में ही हांफ रहे हैं। सडक़ों के घटते मानक स्तर ने वाहन चालकों की कमर तो तोड़ी ही है, साथ ही उनके टायरों को भी वक्त से पहले घिसा दिया है।

मानक लापता, गिट्टियां बाहर : सडक़ है या टायर घिसने की मशीन…

एक दौर था जब ग्वालियर में पीडब्ल्यूडी और नगर निगम की सडक़ें एक तय मानक (स्टैंडर्ड) पर बनती थीं। डामर और गिट्टी का तालमेल ऐसा होता था कि सडक़ें सालों-साल चलती थीं और टायर सुरक्षित रहते थे। लेकिन आज की तारीख में सडक़ निर्माण से गुणवत्ता के मानक गायब होते नजर आ रहे हैं।

तीन गुना बढ़ गया मेंटेनेंस का खर्च

  • सडक़ों के इस रफ लुक का सीधा असर शहरवासियों के बजट पर पड़ रहा है। एक औसत मध्यमवर्गीय परिवार के लिए गाड़ी के टायर बदलना एक बड़ा खर्च होता है।
  • पहले की स्थिति : अच्छे मानक की सडक़ों के कारण एक टायर अमूमन 50 से 60 हजार किलोमीटर या लगभग 3-4 वर्ष तक चलता था।
  • अब की स्थिति : नुकीली गिट्टियों, गड्ढों और घटिया पैचवर्क के कारण टायर 20 से 25 हजार किलोमीटर या मुश्किल से एक वर्ष में ही पूरी तरह घिस रहे हैं।
  • इसके अलावा सडक़ों के झटकों से सस्पेंशन, अलाइनमेंट और बैलेंङ्क्षसग का काम हर दूसरे-तीसरे महीने कराना पड़ रहा है। यानी जनता टैक्स भी दे, बदहाल सडक़ों पर हिचकोले भी खाए और फिर अपनी गाडिय़ों के रखरखाव में हजारों रुपये भी खर्च करे।

सडक़ों के बड़े-बड़े गड्ढे सबसे अधिक काट रहे टायरों को

  • टायर कारोबारियों की मानें तो पिछले कुछ समय में नए टायरों की मांग में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। लेकिन यह बढ़ोतरी किसी खुशी की वजह से नहीं, बल्कि मजबूरी के कारण है। दुकानदारों का कहना है कि लोग शिकायत लेकर आते हैं कि ’’भाई साहब, अभी पिछले साल ही तो टायर डलवाया था, इतनी जल्दी कैसे घिस गया?’’
  • टायर कारोबारी अर्नव चोपड़ा ने बताया कि सडक़ पर बने गड्ढे और उखड़ी हुई सतह टायरों को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाती है। इसके चलते टायर जल्दी घिस जाते हैं और वाहन मालिकों को समय से पहले उन्हें बदलना पड़ता है।

शहरवासियों का दर्द : टायर घिसने से जल्द हो रहे खराब

इवेंट प्लानर गिरीश शर्मा बताते हैं कि सडक़ें बनते ही पहली बारिश में बह जाती हैं। डामर गायब हो जाता है और नुकीली गिट्टियां ऊपर आ जाती हैं। ये सडक़ें नहीं, बल्कि टायर घिसने के कटर बन चुकी हैं। हर रोज आने-जाने में ऐसा लगता है जैसे गाडिय़ां सडक़ पर नहीं, बल्कि पत्थरों के पहाड़ पर चल रही हों। इसके चलते टायर बहुत जल्दी खराब हो रहे हैं।’’