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अनुकंपा नियुक्ति कोई विरासत या अधिकार नहीं, जिसे किसी भी समय मांगा जा सके: हाई कोर्ट

हाईकोर्ट की डबल बैंच ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की बैंच ने एक याचिका को खारिज करते हुए सख्त टिप्पणी की, अनुकंपा नियुक्ति कोई विरासत या उत्तराधिकार का मामला नहीं है, जिसे किसी भी समय मांगा जा सके। कोर्ट ने स्पष्ट किया, इसका मूल उद्देश्य सरकारी कर्मचारी की असमय मृत्यु के बाद परिवार को तत्काल मिले वित्तीय संकट से उबारना होता है,
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ग्वालियर. हाईकोर्ट की डबल बैंच ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की बैंच ने एक याचिका को खारिज करते हुए सख्त टिप्पणी की, अनुकंपा नियुक्ति कोई विरासत या उत्तराधिकार का मामला नहीं है, जिसे किसी भी समय मांगा जा सके। कोर्ट ने स्पष्ट किया, इसका मूल उद्देश्य सरकारी कर्मचारी की असमय मृत्यु के बाद परिवार को तत्काल मिले वित्तीय संकट से उबारना होता है, अंतहीन सहानुभूति देना नहीं। यदि परिवार इतने लंबे समय तक जीवित रहने में सफल रहा है, तो अनुकंपा नियुक्ति की आवश्यकता ही समाप्त हो जाती है। गुना जिले के रहने वाले सुनील ताम्रकार की पत्नी का सेवाकाल के दौरान 14 जनवरी 2017 को निधन हो गया था। इसके बाद उन्होंने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया । लेकिन, न्यूनतम योग्यता (हायर सेकेंडरी में तृतीय श्रेणी होने के कारण) न होने की वजह से जिला शिक्षा अधिकारी गुना ने 13 जून 2017 को उनका आवेदन निरस्त कर दिया था। इस आदेश को चुनौती देने के बजाय याचिकाकर्ता शांत बैठे रहे। इसके बाद, साल 2021 में सरकार के एक सर्कुलर (जिसमें योग्यता हासिल करने के लिए 7 साल का समय दिया गया था) का हवाला देते हुए उन्होंने सहमति पत्र तो दिया, लेकिन कभी अनिवार्य योग्यता हासिल ही नहीं की। करीब 9 साल बाद 2026 में उन्होंने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसे ङ्क्षसगल बेंच ने देरी के आधार पर खारिज कर दिया था । इसके खिलाफ सुनील ने युगल पीठ में अपील दायर की थी। हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न ऐतिहासिक फैसलों (जैसे स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल बनाम देवाब्रत तिवारी) का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति सामान्य भर्ती प्रक्रिया का अपवाद है । इसमें तत्काल आवश्यकता ही राहत का आधार होती है । याचिकाकर्ता ने सालों तक अपने अधिकारों को लेकर कोई सजगता नहीं दिखाई और न ही तय योग्यता हासिल की।

अनुकंपा नियुक्ति को लेकर कोर्ट ने किया स्पष्ट
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा, अनुकंपा नियुक्ति कोई ऐसा निहित अधिकार नहीं है, जिसे भविष्य में कभी भी प्रयोग किया जा सके। यदि पीड़ित परिवार इतने लंबे समय तक बिना नौकरी के अपनी आजीविका चलाने में सक्षम रहा है, तो अब अनुकंपा नियुक्ति देने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। अदालती मामलों में अत्यधिक और अस्पष्टीकृत देरी (लचेस) के कारण याचिकाकर्ता कोर्ट की असाधारण रिट अधिकारिता के तहत राहत पाने का हकदार नहीं रह जाता है।

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