World Sleep Day: डॉ शर्मा कहते हैं देर रात तक जागने की आदत लोगों का स्लीपिंग साइकिल बिगाड़ रही है जिससे उन्हें नींद पूरी ना होने या नींद ना आने की समस्या हो रही है।
World Sleep Day: आधुनिक युग में हर हाथ में मोबाइल देखा जा सकता है। आज के दौर में युवाओं की दिनचर्या तेजी से बदल रही है। देर रात तक मोबाइल, सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर वेब सीरीज देखने की आदत, रील स्क्रोल करने के कारण युवाओं का स्लीपिंग साइकिल बिगड़ता जा रहा है। इसका सीधा असर उनकी शारीरिक और मानसिक सेहत पर पड़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार लगातार देर रात तक जागने से नींद पूरी नहीं हो पाती, जिससे थकान, चिड़चिड़ापन, ध्यान की कमी और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
जीआरएमसी के न्यूरोसर्जन डॉ अविनाश शर्मा कहते हैं पहले के समय में टीवी, मोबाइल नहीं होता था वह समय से सोते थे और समय से काम करते थे लेकिन आज देर रात तक टीवी देखने, मोबाइल चलाने की आदत लोगों के स्वास्थ्य पर खतरा बन रही है। शरीर की एक क्लॉक होती है जिसके अनुसार ही वह काम करती है। उसके इतर शरीर को ढालने का प्रयास करते हैं तो उसके नकारात्मक प्रभाव ही देखने को मिलते हैं। ओपीडी में रोज 10 से 15 केस नींद की शिकायत के ही आ रहे हैं। जिनमें बड़ी संख्या में युवाओं में यह देखने को मिल रही है।
डॉ शर्मा कहते हैं देर रात तक जागने की आदत लोगों का स्लीपिंग साइकिल बिगाड़ रही है जिससे उन्हें नींद पूरी ना होने या नींद ना आने की समस्या हो रही है। जिसके कारण डिप्रेशन, डायबिटीज, बीपी, चिड़चिड़ेपन की शिकायतें आ रही हैं, साथ ही कई लोगों को हेलुसीनेशन के केस भी देखने को मिल रहे हैं जिसमें उन्हें अपना बार बार फोन उठाने की आदत, फोन रिंग होने जैसे भ्रम होते हैं।
जीआरएमसी की मनोरोग विभाग की एचओडी डॉ प्रियंका शर्मा कहती हैं मोबाइल, टीवी, टेब की ब्लू लाइट के कारण मेलाटोनिन हार्मोन कम होती है, जिससे दिन और रात का सर्कैडियन रिदम होता है वह काम नहीं करता। और नींद कम आती है और उसकी क्वालिटी भी खराब होने लगती है। लोगों की दिनचर्या में जो बदलाव हो रहा है और वह अपने स्लीङ्क्षपग साइकिल पर ध्यान नहीं देते जिस कारण शरीर की प्राकृतिक साइकिल अनियमित हो जाती है। इससे डायबिटीज, बीपी की समस्या के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत अधिक असर पड़ रहा है।