जिले के 400 से ज्यादा स्कूलों में निशक्तों के लिए नहीं सुविधाएं, न रैंप दिखे न रैलिंग

नि:शक्त बच्चों की मदद के लिए केन्द्र सरकार कई योजनाएं चला रही है, पर इन बच्चों के लिए जिले के तीन फीसदी से ज्यादा स्कूलों में रैंप के साथ रेलिंग नहीं है। इन बच्चों को स्कूलों तक पहुंचने में परेशानी का सामना करना पड़ता है।
2 min read
• •
Updated: 18 Jan 2017, 10:52 AM IST
no facility for disable
no facility for disable
ग्वालियर। नि:शक्त बच्चों की मदद के लिए केन्द्र सरकार कई योजनाएं चला रही है, पर इन बच्चों के लिए जिले के तीन फीसदी से ज्यादा स्कूलों में रैंप के साथ रेलिंग नहीं है। इन बच्चों को स्कूलों तक पहुंचने में परेशानी का सामना करना पड़ता है। नियम है कि स्कूल में नि:शक्त बच्चे हों या न हों, पर उनमें चढऩे-उतरने के लिए रैलिंग होना आवश्यक है।









लाइव-1
नींव अभियान के तहत पत्रिका टीम जब रमटा पुरा स्थित प्राथमिक विद्यालय पहुंची तो यहां बच्चों के लिए रैंप के नाम पर गाड़ी को चढ़ाने के लिए बनाई जाने वाली स्ट्रिप तो बनी मिली पर उसमें सहारे के लिए रेलिंग नहीं थी। हालांकि यहां विशेष आवश्यकता वाले बच्चे दर्ज नहीं थे।








लाइव-2
द्वारिका पुरी स्थित तेज सिंह कंॉम्प्लेक्स में संचालित 62 बच्चों की संख्या वाले स्कूल में न तो रैंप है, ना ही रेलिंग। शिक्षकों का दावा है कि यहां दो साल से कोई विशेष आवश्यता वाला बच्चा नहीं आया, जिससे न तो रैंप बनवाया गया और ना ही रेलिंग ।


Image may contain: text



ऐसे मदद करता है शासन
संभाग के सभी आठों जिले में करीब 25 हजार विशेष आवश्यता वाले बच्चे सरकारी प्राइमरी स्कूलों में पढ़ते हैं। निजी स्कूलों और दिव्यांगों के लिए बनाए गए स्कूलों में यह संख्या अलग है। स्कूल पहुंचने वाले बच्चों की मदद के लिए सरकार दो तरह से मदद करती है। सामाजिक न्याय विभाग की ओर से साल में पांच सौ रुपए की पेंशन राशि मिलती है, वहीं राज्य शिक्षा केन्द्र द्वारा उन्हें हर साल ढाई हजार रुपए दिए जाते हैं।


No automatic alt text available.




रेलिंग के बारे में दिखवाना पड़ेगा
" जिले के लगभग सभी स्कूलों में नि:शक्त बच्चों के लिए रैंप बने हुए हैं। उन्हें शासन से नियमित रूप से मदद भी मिलती है, पर रैलिंग के बारे में दिखवाना पड़ेगा।"
केजी शुक्ला, डीपीसी, सर्व शिक्षा अभियान
Published on: