MP High Court- ग्वालियर हाईकोर्ट ने कहा: कर्तव्य पालन में फेल हुए कलेक्टर
MP Highcourt- मध्यप्रदेश में सरकारी जमीनों पर नाजायज कब्जे का खेल लगातार जारी है। हालांकि इसके खिलाफ कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। सरकारी जमीनों को भू- माफियाओं के हवाले करने के खेल में शामिल लापरवाह अधिकारियों के लिए कोर्ट के कडे तेवर के बाद राज्य सरकार ने नई और सख्त गाइडलाइन जारी की। सामान्य प्रशासन विभाग ( जीएडी ) ने हाईकोर्ट में यह नीति पेश करते हुए साफ कर दिया है कि यदि किसी अधिकारी की लापरवाही या मिलीभगत से शासन केस हारता है, तो उस जमीन या राशि के नुकसान की भरपाई संबंधित अधिकारी की जेब से की जाएगी। हाईकोर्ट ने एक मामले में मुख्य सचिव और राजस्व विभाग से जवाब मांगा था। ग्वालियर जिले में ही ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां बेशकीमती सरकारी जमीनें निजी हाथों में सिर्फ इसलिए चली गईं क्योंकि सरकारी वकीलों और अधिकारियों ने समय पर पुख्ता रिकॉर्ड पेश नहीं किए। सरकारी जमीन के एक ऐसे ही मामले में हाईकोर्ट ने फिर कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि कलेक्टर फेल हो गए हैं।
ग्वालियर कलेक्ट्रेट में सरकारी जमीनों के रिकॉर्ड की सुरक्षा भगवान भरोसे है। एक बेशकीमती जमीन से जुड़ी फाइल ही गायब हो गई है। ग्वालियर हाईकोर्ट ने इसपर बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। कोर्ट की एकल पीठ ने कलेक्टर पर
तल्ख टिप्पणी भी की।
हाईकोर्ट ने कहा कि कलेक्टर अपने कर्तव्य के पालन में विफल रही हैं। इतना ही नहीं, कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कलेक्ट्रेट में किसी ने जानबूझकर फाइलें हटाई हैं। हाईकोर्ट ने मामले की जांच के भी आदेश दिए। अब इस पूरे 'फाइल कांड' की जांच प्रमुख सचिव (राजस्व) करेंगे।
मामला कोटा लश्कर स्थित मंदिर की 5.19 बीघा सरकारी जमीन से जुड़ा है। इस जमीन पर निजी पक्ष के हक में फैसला होने के बाद शासन ने अपील करने में 3327 दिन की देरी की थी।
बता दें कि सरकारी जमीन के मामलों में अदालतों में कमजोर पैरवी, जानबूझकर देरी से अपील दायर करने और रिकॉर्ड छिपाने जैसी कारगुजारियों पर हाईकोर्ट कई बार कड़ी नाराजगी जाहिर कर चुका है। कुछ दिनों पूर्व ही ग्वालियर हाईकोर्ट ने साफ कहा था कि अधिकारी निजी पक्षों को लाभ पहुंचाने के लिए शासन के हितों की बलि चढ़ा रहे हैं।
कोर्ट के इसी दबाव के बाद सरकार ने नई व्यवस्था लागू की है, जिसमें अब जवाबदेही कागजों पर नहीं, बल्कि मैदान में दिखेगी। सामान्य प्रशासन विभाग की नई गाइडलाइन के अनुसार यदि किसी प्रकरण में अधिकारी की लापरवाही या देरी के कारण शासन के खिलाफ फैसला आता है और आर्थिक नुकसान होता है, तो उसकी वसूली संबंधित शासकीय सेवक से की जाएगी। साथ ही कार्रवाई भी होगी।