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60 दिन के अंदर देना होगा ‘रिटायरमेंट’ का पूरा पैसा, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

MP News: अपीलकर्ता को 29 जुलाई 2021 को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गई थी। इस आदेश को चुनौती देने पर पूर्व में कोर्ट ने इसे निरस्त कर दिया था...
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ग्वालियर

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Astha Awasthi

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Updated: 20 Apr 2026, 4:30 PM IST

समर वेकेशन से पहले हाईकोर्ट की नई सुनवाई व्यवस्था लागू, नई बेंचों को मिली जिम्मेदारी(photo-patrika)

समर वेकेशन से पहले हाईकोर्ट की नई सुनवाई व्यवस्था लागू, नई बेंचों को मिली जिम्मेदारी(photo-patrika)

MP News:मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्ति लाभों के भुगतान में देरी को लेकर अहम आदेश दिया है। अदालत ने राज्य शासन को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि 60 दिन के भीतर समस्त भुगतान किया जाए, अन्यथा देरी की स्थिति में 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा। मामला उमेश कुमार गुप्ता की रिट अपील से जुड़ा है। अपीलकर्ता को 29 जुलाई 2021 को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गई थी।

इस आदेश को चुनौती देने पर पूर्व में कोर्ट ने इसे निरस्त कर दिया था और उन्हें 31 जुलाई 2023 तक सेवा में मानते हुए सभी रिटायरमेंट लाभ देने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद अपीलकर्ता ने बकाया राशि पर ब्याज नहीं दिए जाने को लेकर पुनः अपील दायर की। उन्होंने दलील दी कि कार्रवाई नियमों के विपरीत थी, इसलिए उन्हें ब्याज मिलना चाहिए। वहीं, राज्य शासन ने इसका विरोध किया।

7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना अनिवार्य

खंडपीठ ने सुनवाई के बाद माना कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश वैधानिक प्रावधानों के तहत पारित हुआ था और वह न्यायालय में विचाराधीन रहा। ऐसे में उस अवधि के लिए ब्याज देने का आधार नहीं बनता।

हालांकि, जस्टिस आनंद पाठक व जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अब आदेश के पालन में देरी स्वीकार नहीं होगी। कोर्ट ने कहा कि यदि निर्धारित 60 दिन की अवधि में भुगतान नहीं किया गया तो अपीलकर्ता को देरी की अवधि के लिए 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना अनिवार्य होगा। इसी निर्देश के साथ रिट अपील का निराकरण कर दिया गया।

‘पेंशन’ को लेकर हाइकोर्ट ने दिखाई सख्ती

बीते दिनों हाइकोर्ट ने पेंशन को लेकर सख्ती दिखाई है। भ्रष्टाचार के मामलों में सख्ती दिखाते हुए हाईकोर्ट ने दोषी पाए गए एक सेवानिवृत्त अधिकारी की पेंशन पूरी तरह बंद करने के राज्य सरकार के फैसले को बरकरार रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी की कि भ्रष्टाचार जैसे गंभीर अपराधों में दया या सहानुभूति की कोई जगह नहीं है और ऐसे मामलों में कठोर दंड ही उचित है। न्यायालय ने कहा कि यदि कोई कर्मचारी भ्रष्टाचार में दोषी पाया जाता है तो उसके लिए न्यूनतम पेंशन का प्रावधान लागू नहीं होता और उसकी पूरी पेंशन रोकी जा सकती है।

कोर्ट ने यह भी माना कि पेंशन बंद करने की प्रक्रिया विधिसम्मत तरीके से, राज्यपाल के नाम से जारी आदेश के तहत की गई है, इसलिए इसमें कोई कानूनी त्रुटि नहीं है। याचिकाकर्ता धनराज गौर की ओर से दलील दी गई थी कि बिना सुनवाई का अवसर दिए उनकी पेंशन रोकी गई, जो नियमों के विरुद्ध है, और पूरी पेंशन रोकना अनुचित है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इन तर्कों को खारिज करते हुए उनकी याचिका निरस्त कर दी।