
ग्वालियर. आमतौर पर नौकरी से सेवानिवृत्ति के बाद लोग आराम की जिंदगी बिताते हैं। लेकिन शहर के कुछ रिटायर्ड गुरुजी ऐसे हैं, जिनके लिए रिटायरमेंट का मतलब बच्चों से दूरी नहीं, बल्कि उन्हें अधिक समय देना है। शिक्षक, प्राचार्य और बैंक अधिकारी नौकरी से रिटायर होने के बाद भी पिछले छह साल से बच्चों को निशुल्क पढ़ा रहे हैं। जरूरतमंद बच्चों की कॉपी-किताब और पढ़ाई से जुड़ी अन्य आवश्यकताओं पर अपनी जेब से खर्च भी कर रहे हैं। शिक्षक दिवस 5 सितंबर को है, पत्रिका ने दो दिन पूर्व से ही मेरा गुरु मेरी सीख अभियान से शिक्षकों के जुनून पर प्रकाश डालना शुरू किया है। आज ऐसे शिक्षकों और समाजसेवियों से मिलवा रहे हैं, जिन्होंने नौकरी खत्म होने के बाद भी शिक्षा देने का काम नहीं छोड़ा। इनके लिए न वेतन है, न फीस और न किसी सम्मान की अपेक्षा। मकसद सिर्फ इतना है कि आर्थिक तंगी के कारण किसी बच्चे की पढ़ाई न रुके।
इनका रिटायरमेंट, बच्चों के भविष्य की शुरुआत
इन सभी की खासियत है कि वे बच्चों से कोई फीस नहीं लेते। इनका मानना है कि ज्ञान जितना बांटा जाए, उतना बढ़ता है। नौकरी के दौरान यह उनकी जिम्मेदारी थी, लेकिन अब बच्चों को पढ़ाना उनका जुनून बन गया है। बच्चों की सफलता ही उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान है।
शिक्षा के बाजार में निस्वार्थ सेवा की मिसाल हैं ये चेहरे