
राजस्थान अपने राजसी ठाट-बाट और नायाब नस्ल के पशुओं के लिए दुनिया भर में मशहूर है। इसी कड़ी में हनुमानगढ़ जिले के टिब्बी तहसील क्षेत्र के गांव गुड़िया से एक ऐसी खबर आई है जो पशुपालन जगत में सुर्खियां बटोर रही है। दरअसल, इस गांव की शान और पहचान बन चुका दुर्लभ सुनहरे रंग का मारवाड़ी घोड़ा, जिसका नाम 'गोल्डन किंग' है, अब राजस्थान को अलविदा कहकर गुजरात के सूरत शहर चला गया है। इस घोड़े की बनावट, इसका चमकता हुआ सुनहरा रंग और इसकी राजसी चाल इतनी आकर्षक थी कि सूरत के एक अश्वपालक ने इसे 70 लाख रुपये की भारी-भरकम राशि देकर खरीद लिया है। जब इस घोड़े को उसके नए मालिक के हवाले किया गया, तो पूरे गांव की आंखें नम हो गईं।
इस दुर्लभ घोड़े के मालिक और गुड़िया गांव के निवासी अश्वपालक अल्ताफ उर्फ बाबू खां ने 'गोल्डन किंग' की शारीरिक विशेषताओं के बारे में कई रोचक और वैज्ञानिक तथ्य साझा किए। अल्ताफ ने बताया कि वह कुछ साल पहले इस घोड़े को हरियाणा से लेकर आए थे, जब यह काफी छोटा था। धीरे-धीरे जैसे-जैसे इसकी उम्र बढ़ी, इसका रंग पूरी तरह से सोने की तरह चमकने लगा।
अल्ताफ ने इसके जन्म से जुड़ी सबसे हैरान कर देने वाली बात बताते हुए कहा, "गोल्डन किंग के माता और पिता दोनों ही शुद्ध काले रंग के मारवाड़ी नस्ल के घोड़े हैं। सामान्यतः आनुवंशिक विधा के अनुसार काले माता-पिता की संतान भी काली या गहरे रंग की होती है, लेकिन यह घोड़ा प्राकृतिक रूप से और पूरी तरह कुदरती करिश्मे के कारण चमकीले सुनहरे रंग का पैदा हुआ। मारवाड़ी नस्ल में इस तरह का दुर्लभ रंग करोड़ों में से किसी एक घोड़े का ही होता है, जो इसे पूरे देश के अश्व प्रेमियों के बीच बेहद खास और कीमती बनाता है।"
जब सूरत से आए नए मालिक की गाड़ी 'गोल्डन किंग' को ले जाने के लिए गुड़िया गांव पहुंची, तो वहां का नजारा किसी बेटी की विदाई जैसा भावुक हो गया। वर्षों तक गांव के गौरव और शान का प्रतीक रहे इस घोड़े को अंतिम बार देखने और विदा करने के लिए सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण अल्ताफ के फार्म हाउस पर जमा हो गए।
गांव के बुजुर्गों और युवाओं ने नम आंखों से गोल्डन किंग को सहलाया और उसे विदा किया। इस दौरान गांव के युवाओं में इस अनोखे घोड़े के साथ तस्वीरें और सेल्फी खिंचवाने की होड़ मची रही। ग्रामीणों का कहना था कि गोल्डन किंग के कारण उनके छोटे से गांव का नाम पूरे राजस्थान और हरियाणा के पशु मेलों में बड़े गर्व से लिया जाता था, और उसका गांव से जाना सभी को खल रहा है।
अल्ताफ उर्फ बाबू खां ने बताया कि मारवाड़ी नस्ल के सुनहरे रंग के घोड़ों की मांग देश ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत अधिक होती है। पिछले 2 वर्षों से इस घोड़े को खरीदने के लिए पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और मुंबई तक के बड़े-बड़े घोड़ों के शौकीनों और राजा-महाराजाओं के परिवारों के एजेंट संपर्क कर रहे थे।
इस घोड़े में केवल रंग की ही विशेषता नहीं है, बल्कि इसकी अन्य खूबियां भी लाजवाब हैं,
संतुलित चाल: इसकी चाल इतनी सधी हुई और राजसी है कि यह किसी बड़े अश्व शो का विजेता लगने लगता है।
आकर्षक व्यक्तित्व और कान: मारवाड़ी नस्ल की सबसे बड़ी पहचान इसके अंदर की तरफ मुड़े हुए चक्राकार कान होते हैं, जो गोल्डन किंग में पूरी तरह आदर्श स्थिति में हैं।
कद-काठी: इसकी सुगठित मांसपेशियां और चौड़ी छाती इसके ऊंचे और लंबे कद को एक बेहतरीन लुक देती हैं, जिसके कारण यह जहां भी जाता था, लोगों की भीड़ लग जाती थी।
सूरत के खरीदार ने इसके दुर्लभ रंग और मारवाड़ी जेनेटिक्स के इस अनोखे मेल को देखते ही 70 लाख रुपये की अंतिम डील पक्की कर ली।