https://www.patrika.com/hanumangarh-news/ हनुमानगढ़. कृषि प्रधान हनुमानगढ़ जिले में कई चौकाने वाले बदलाव आ रहे हैं। इन बदलावों को खेती-किसानी के संदर्भ में कुछ अच्छा संकेत नहीं कह सकते।
बड़े से 'छोटे' बन रहे हमारे किसान, कृषि प्रधान हनुमानगढ़ जिले में लघु जोत श्रेणी के किसानों की संख्या बढ़कर हुई 35327
-जिला बनने के दौरान वर्ष १९९४-९५ में १८९१७ थे लघु जोत वाले किसान, दो दशक में कृषि क्षेत्र में आए कई चौकाने वाले बदलाव
हनुमानगढ़. कृषि प्रधान हनुमानगढ़ जिले में कई चौकाने वाले बदलाव आ रहे हैं। इन बदलावों को खेती-किसानी के संदर्भ में कुछ अच्छा संकेत नहीं कह सकते। स्थिति यह है कि बीते दो दशक में हनुमानगढ़ जिले में लघु (छोटी) जोत वाले किसानों की संख्या बढ़कर ३५३२७ हो गई है। जबकि जिला बनने के दौरान वर्ष १९९४-९५ में इनकी संख्या १८९१७ के करीब थी।
इन आंकड़ों पर नजर दौड़ाने से साफ होता है कि छोटे किसानों की संख्या दोगुनी हो गई है। यह तस्वीर इस हकीकत को बयां कर रही है कि कृषि भूमि के मामले में हमारे बड़े किसान धीरे-धीरे छोटे बनते जा रहे हैं। कृषि के जानकारों का कहना है कि छोटी जोत वाले किसानों की संख्या बढऩे पर खेती को ज्यादा फायदा नहीं होता।
कम जमीन होने के कारण संबंधित व्यक्ति के परिवार का भरण-पोषण खेती से नहीं हो पाता। इसलिए उसमें कृषि के प्रति अलगाव भाव पनपने लगता है। इस समय हनुमानगढ़ की पहचान कृषि प्रधान जिले के तौर पर होती है। प्रदेश में हमारे जिले को अन्न का कटोरा नाम से भी जाना जाता है। यह अन्न का कटोरा सुरक्षित रहे, इसके लिए सबको मिलकर सोचना होगा। तभी भविष्य में भी हम कृषि प्रधान जिले के तौर पर अपनी पहचान को कायम रख सकेंगे।
लघु जोत का क्षेत्रफल भी बढ़ा
हनुमानगढ़ जिले में बीते दो दशक में लघु जोत वाले किसानों की संख्या जहां दोगुनी हो गई है। वहीं लघु जोत वाली भूमि भी दोगुनी हुई है। जिले में वर्ष १९९४-९५ में इनकी संख्या २७७७७ हेक्टेयर थी। जिनकी संख्या वर्ष २०१५-१६ में बढ़कर ५१५८८ हैक्टेयर हो गई। हर पांच वर्ष बाद कृषि गणना के आंकड़े जारी होते हैं। इस तरह वर्ष २०२०-२१ के आंकड़े अगले वर्ष जारी किए जाएंगे। इसमें इनकी संख्या और बढ़ सकती है। लघु जोत की श्रेणी में एक से १.९९ हेक्टेयर भूमि वाले किसान आते हैं।
प्रति किसान जमीन घटी
वर्ष १९९४-९५ में हनुमानगढ़ जिले में औसत रूप से ६.०१ हेक्टेयर प्रति किसान कृषि भूमि थी। जो अब वर्ष २०१५-१६ में घटकर ४.५१ हेक्टेयर रह गई है। प्रति किसान भूमि लगातार घट रही है। अगले वर्ष जारी होने वाले आंकड़ें में इसकी संख्या और घट सकती है।
बदल जाएगी श्रेणी
गांवों छोटी जोत वाले किसानों की स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है। कम जमीन में खेती करने से उनके परिवार का जब पोषण नहीं कर पाते हैं तब वह शहरों में मजदूरी करने लग जाते हैं। इस तरह छोटी जोत वाले किसानों को गांवों में ही रोके रखने के लिए सरकार स्तर पर भी योजना बनाने की जरूरत है। नहीं तो हमारे किसान धीरे-धीरे मजदूरों की श्रेणी में आ जाएंगे।
......फैक्ट फाइल.....
-वर्ष १९९४-९५ में हनुमानगढ़ जिले में औसत रूप से ६.०१ हेक्टेयर प्रति किसान कृषि भूमि थी।
-वर्ष १९९४-९५ में लघु जोत वाले किसानों की संख्या १८९१७ थी, जो अब ३५३२७ हो गई है।
-वर्ष १९९४-९५ में जिले में सभी श्रेणी के किसानों की संख्या १४५९३४ थी, जो बढ़कर अब १९२४७७ हो गई।
-वर्ष १९९४-९५ में औसतन किसानों के पास ६.०१ हेक्टैयर कृषि भूमि थी, जो घटकर अब ४.५१ हेक्टेयर हो गई है।
.....वर्जन....
कई कारण हो सकते हैं
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बीते दो दशक की तुलना में जिले में लघु जोत वाले किसानों की संख्या बढ़ी है। कृषि गणना संबंधी जारी आंकड़े में इस तरह की सूचनाएं सामने आई है। इसके बहुत से सामाजिक और आर्थिक कारण हो सकते हैं। शहरीकरण का तेजी से हो रहा विस्तार और गांवों में लगातार जमीनों के हो रहे बंटवारे इसके अहम दो कारण हो सकते हैं।
-विनोद गोदारा, सहायक निदेशक, आर्थिक एवं सांख्यिकी विभाग, हनुमानगढ़
......वर्जन....
खेती में बहुत विकल्प
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किसानों के लिए खेती का कार्य अब भी काफी लाभकारी है। सबने देखा है कि लॉकडाउन में भी कृषि व उद्यानिकी कार्य जारी रहे। छोटी जोत वाले किसानों को तकनीकी और प्रायोगिक तौर पर ट्रेनिंग देकर उन्हें उद्यानिकी फसलों की तरफ डायवर्ट करने की जरूरत है। इन किसानों को उद्यानिकी कार्य की तरफ प्रोत्साहित किया जाए तो बेहतर परिणाम आ सकते हैं।
.......पत्रिका व्यू.......
तभी फलती-फूलती रहेगी हमारी धरती
हनुमानगढ़ की मिट्टी सैंकड़ों बरस पहले से ही खूब ऊपजाऊ रही है। हड़प्पाकालीन सभ्यता के दौरान भी यहां उन्नत कृषि के प्रमाण मिले हैं। जिले के कालीबंगा संग्रहालय में रखे हल और बैलगाड़ी के खिलौने इस बात का संकेत देते हैं कि हमारे पूर्वज खेती से कितना लगाव रखते थे। पालतू पशुओं के कंकाल भी खनन के दौरान खूब मिले हैं। जो यह बताता है कि हमारे पूर्वज खेती में इनका सहयोग लेेते थे। लेकिन बदलते दौर में कृषि क्षेत्र में पशुओं का उपयोग अब लगभग खत्म होने को है। खेती में आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल होने लगा है। अधिक उत्पादन लेने की सनक में पेस्टीसाइड और खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल होने से हमारे यहां की मिट्टी की ऊपजाऊ क्षमता भी लगातार प्रभावित हो रही है। वहीं लगातार हो रहे बंटवारे के चलते छोटी जोत वाले किसानों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यानी कृषि के लिहाज से हमारे बड़े किसान अब छोटे होते जा रहे हैं। जो कृषि प्रधान जिले के लिए ज्यादा ठीक स्थिति नहीं है। क्योंकि आधुनिक युग में एक से दो हैक्टेयर जमीन वाले किसानों के लिए खेती करने जीवन यापन करना काफी मुश्किल हो रहा है। यह स्थिति उनमें खेती के प्रति अलगाव की भावना पैदा करता है। पूंजीवादी युग में अन्नदाताओं को अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए उन्हें छोटी जोत की जगह संयुक्त रूप से की जाने वाली खेती को प्रोत्साहित करना होगा। प्रकृति के अनुकूल खेती के औजार अपनाने पड़ेंगे। आपसी भाईचारे की भावना को तवज्जो देने के साथ ही मित्र कीटों से मित्रता निभानी होगी। तभी हमारी धरती भविष्य में भी फलती-फूलती रहेगी।