https://www.patrika.com/hanumangarh-news/ अदरीस खान.हनुमानगढ़. खेती-किसानी से संबंधित कृषि उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवद्र्धन और सुविधा) अध्यादेश लोकसभा में हो चुके हैं। इन नए कानूनों को लेकर आशंकाओं और संभावनाओं को लेकर चर्चा जोरों पर है। हर बार की तरह इन कानूनों को लेकर भी सत्ता पक्ष के लोग सरकार को वाहवाही दे रहे हैं, वहीं विपक्ष इनकी आलोचना कर किसानों के लिए संकट की स्थिति बता रहा है।
किसान कानूनों की कहानी, हनुमानगढ़ में समर्थन-विरोध की जुबानी
- खुली खरीद खोलेगी संभावनाओं के द्वार, सुधरेगी किसानों की स्थिति, मान रहे फायदेमंद
- कोर्ट के द्वार पर दस्तक नहीं देने, स्टॉक सीमा समाप्त करने और एमएसपी का प्रावधान नहीं होने को मान रहे खतरा
अदरीस खान.हनुमानगढ़. खेती-किसानी से संबंधित कृषि उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवद्र्धन और सुविधा) अध्यादेश लोकसभा में हो चुके हैं। इन नए कानूनों को लेकर आशंकाओं और संभावनाओं को लेकर चर्चा जोरों पर है। हर बार की तरह इन कानूनों को लेकर भी सत्ता पक्ष के लोग सरकार को वाहवाही दे रहे हैं, वहीं विपक्ष इनकी आलोचना कर किसानों के लिए संकट की स्थिति बता रहा है। न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर कानून में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं होने, स्टॉक सीमा हटाने, कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग विवाद की स्थिति में अदालत का द्वार खटखटाने के प्रावधान खत्म कर देने को किसान से लेकर आम आदमी तक के लिए खतरे की घंटी बताया जा रहा है।
वहीं नए कानूनों के समर्थन में जो पक्ष है, उनका दावा है कि इससे किसानों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी। यह एक इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग एंड ट्रांजेक्शन प्लेटफार्म योजना है। किसान राज्य व अंतरराज्यीय स्तर पर अपनी उपज बेच सकेगा। खेत से ही डिलीवरी ली जा सकेगी। किसान को मंडी शुल्क नहीं देना होगा। कोई विवाद होने पर एसडीएम की ओर से गठित समझौता समिति निर्णय करेगी।
नहीं जा सकेंगे कोर्ट
किसान और संबंधित कंपनी-उधोगपति में यदि विवाद हो जाता है तो इस मामले को कोर्ट में नहीं ले जाया जा सकेगा। विवाद होने पर एसडीओ की ओर से बनाई गई समिति फैसला करेगी। इसकी अपील कलेक्टर को होगी। ऐसे मामलों में कोर्ट क्षेत्राधिकार नहीं रहेगा।
एमएसपी का नहीं प्रावधान, लूट की छूट
ओम जांगू कहते हैं कि नए कानून में एमएसपी के संबंध में कोई प्रावधान नहीं किया गया है। आज बाजरे का समर्थन मूल्य 2150 रुपए प्रति क्विंटल है। जबकि किसान 1100 रुपए विक्रय करने को मजबूर है। मक्के का एमएसपी 1650 रुपए, बिक रहा 860 रुपए क्विंटल है। स्टॉक सीमा समाप्त करने से बड़े व्यापारी सस्ती दरों पर कृषि जिंस खरीदेंगे। फिर कृत्रिम अभाव पैदा कर ऊंची दरों पर विक्रय करेंगे। इससे देश का आम नागरिक लूट का शिकार होगा। कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग में विवाद की स्थिति में कानूनी प्रावधान समाप्त कर देना, एक तरह से केन्द्र सरकार ने बड़े बिजनेसमैन को किसानों से लूट की खुली छूट दे दी है। केन्द्र सरकार ने कृषि एवं आवश्यक वस्तु विक्रय अधिनियम जो संशोधन किए हैं, वह केवल मंडियों को खत्म करने और बड़े उद्योगपतियों को छूट देने वाले हैं। साथ ही देश के आम नागरिक को गुलामी में जकडऩे वाले हंै। कृषि उत्पादों को सीधा क्रय करने का प्रावधान मूल्यों की प्रतिस्पर्धा को समाप्त करेंगे। किसान के पास वर्तमान जोत बहुत छोटी है। वह अपने उत्पादन को लम्बे समय तक और एक मुश्त विक्रय करने की स्थिति में नहीं है। इस स्थिति में किसान आज भी एमएसपी पर अपना उत्पादन विक्रय करने से वंचित है।
यह बताए जा रहे लाभ
नए कानूनों के समर्थक इसे इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग एंड ट्रांजेक्शन प्लेटफार्म योजना बता रहे हैं। इसमें किसान अपनी उपज राज्य व अन्तराज्यीय स्तर पर बेच सकता है। कोई व्यापारी जिसका परमानेंट अकाउंट नंबर हो, वह किसी किसान से उसकी फसल ऑनलाइन ट्रांजेक्शन से खरीद सकता है। डिलीवरी खेत से हो सकती है। इस पर मंडी शुल्क नहीं लगेगा। कोई विवाद होने के मामले में एसडीओ की समझौता समिति निर्णय करेगी। किसान अपनी फसल बुआई के समय व खड़ी फसल बेचने का एग्रीमेंट कर सकता है जो ऑनलाइन किए जाने का प्रावधान है। एग्रीमेंट में कीमत आदि की शर्तें लिखी जाएंगी। उपज की किस्म व भाव तय किए जाएंगे। ऐसे ट्रांजेक्शन में ईसी एक्ट लागू नहीं होगा। भुगतान के बाद ही उपज की डिलीवरी होगी। खेती में सेवाएं देने के लिए भी एग्रीमेंट किया जा सकेगा। उपज बीज है तो दो तिहाई भुगतान डिलीवरी के समय और शेष बीज प्रमाणीकरण पर एक माह में करना होगा। अन्नाज की आपूर्ति अकाल, युद्ध, आपदा, अत्यधिक कीमतें बढऩे पर स्टॉक नियंत्रण बागान उपज में दोगुनी कीमत व अन्य उपज में डेढ़ गुना कीमत पर।
पीछे के रास्ते से कालाबाजारी
नए कानूनों से प्रत्यक्ष रूप से किसानों को लाभ है। किसान अपनी मर्जी व इच्छा के अनुरूप फसल विक्रय कर सकेगा। काश्तकार खेत में रहकर भी सब जगह फसल बेच सकता है। संभावित नुकसान यह है कि एक व्यक्ति स्टॉक कर महंगा बेच सकता है। इससे पीछे के रास्ते से कालाबाजारी का मार्ग खुल जाता है। महंगाई पर नियंत्रण की स्थिति बिगड़ सकती है। - शंकर सोनी, वरिष्ठ अधिवक्ता।
बिना तैयारी, बगैर विश्वास
कोरोना महामारी में देश की अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तम्भ रहे कृषि क्षेत्र के संबंध में देश का शीर्ष नेतृत्व बिना किसी तैयारी, जरूरत व किसान को विश्वास में लिए बगैर तीन अध्यादेश लाता है। किसान विरोध के बावजूद सत्ता के घमंड में पारित भी करवा लिया जाता है। प्रधानमंत्री इसे किसान हितैषी व मंडियों के व्यापारियों को बिचौलियों के रूप में आईटी सेल से प्रचारित करवाते हैं। किसान विरोध को सीएए, एनआरसी विरोधियों की तरह राष्ट्र विरोधी बताने की हिम्मत सत्ता पक्ष में नहीं है। किसान के मन में नोटबंदी, जीएसटी फैल होने से इन अध्यादेशों के प्रति वाजिब शंकाएं हैं, उनका ठोस समाधान जरूरी है। जयपाल झोरड़, वरिष्ठ अधिवक्ता एवं कांग्रेस नेता।
पीड़ा से मिलेगी मुक्ति
मंडी में फसल बेचने के लिए किसानों को कई दिन तक वहां प्रतीक्षा करनी पड़ती है। आज हर मंडी में बोलीदाता और फसल के रेट तय करने वाले कुछ व्यक्तियों का ग्रुप बना हुआ है जो मनमानी करता है। किसानों में फसल की गुणवत्ता तय करने की जानकारी का अभाव है। पेस्टिसाइड्स का अंधाधुंध प्रयोग हो रहा है। यह हालात बदलने चाहिए। पुरानी व्यवस्था अपने उद्देश्यों पर खरी नहीं उतरी है। इसलिए सिर्फ कुछ लोगों के आकलन के आधार पर इन विधेयक का विरोध नहीं होना चाहिए। नवाचार का स्वागत होना चाहिए। - हनीश ग्रोवर, पीलीबंगा।
सरकार की मंशा ठीक नहीं
कृषि संबंधी लाए जा रहे तीनों अध्यादेश किसान व व्यापारी हितों को ज्यादा फायदा नहीं पहुंचा रहे हैं। इससे बड़ी कंपनियों का प्रभाव बढ़ेगा। किसानों की स्थिति तो यह है कि सरकार यदि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसलों की खरीद कर ले तो उन्हें राहत मिल जाएगी। लेकिन नए अध्यादेश में समर्थन मूल्य की गारंटी नहीं है। सरकार की मंशा इन अध्यादेशों को लेकर ठीक नहीं लग रही। अगर किसानों की आय ही बढ़ानी है तो सरकार समर्थन मूल्य का रेट बढ़ाए, खुद खरीद करे। आयात और निर्यात नीतियां किसान व स्थानीय व्यापारियों के हितों को देखते हुए बनाए। सरकार इन तीनों अध्यादेशों के जरिए आमदनी बढ़ाने का भ्रमजाल फैला रही है। - रघुवीर वर्मा, माकपा नेता, हनुमानगढ़।