हाथरस को जिले का दर्जा 3 मई को मिला था, बावजूद इस शहर के विकास की ओर किसी सरकार का ध्यान नहीं गया।
इस बारे में समाज सेवी प्रवीण वार्ष्णेय का कहना है कि केवल जनपद का दर्जा देना बड़ी बात नहीं है। जनपद बनाने के लिए उसे बुनियादी रूप से मजबूत बनाना पड़ता है। हाथरस में ऐसा कुछ नहीं है जिसके आधार पर इसे जनपद कहा जा सके। यहां शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी सुविधाएं भी बेहतर नहीं हैं। रोजगार के लिए लोगों को यहां से बाहर जाना पड़ता है। उच्च शिक्षा के लिए भी बच्चों को बाहर भेजना पड़ता है, यहां तक कि स्वास्थ्य की सेवाएं लेने के लिए भी जनपदवासी दूसरे शहरों में पैसा खर्च करते हैं। जो हालात 21 साल पहले थे, वही आज भी हैं। हाथरस को सिर्फ जिले का तमगा दिया गया है और कुछ भी नहीं।
वहीं व्यापारी महेन्द्र सिंह सोलंकी का कहना है कि जिला जरूर बना है, पर विकास की ओर किसी भी सरकार का ध्यान नहीं रहा। बदलाव के नाम पर ये हाल हुआ कि हाथरस में जो व्यापार थे, वे भी समाप्त हो गए। बहुत सारी मिलें बंद हो गईं। सरकार के नुमाइंदों ने अपनी राजनीति चमकाने के अलावा कुछ नहीं किया। बिजनेस को बढ़ाने की ओर किसी का ध्यान नहीं गया। यहां पूरे दिन जाम की समस्या रहती है। जो सरकार आती है वो पुल का निर्माण कराने की बात करती है, लेकिन कुछ नहीं होता। आज के समय में न तो यहां ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था है और न ही यहां कोई अपना शोरूम खोलना चाहता है। जिला बनने के बाद यहां नुकसान ज्यादा हुआ और फायदा कम।